Monday, October 20, 2014

Murli-20/10/2014-English

Essence: Sweet children, hear no evil! You are sitting here in the company of the Truth. You must not get into the bad company of Maya. By being influenced by bad company, you choke with doubts. Question: Why can no human being at this time be called spiritual? Answer: Because all are body conscious. How can those who are body conscious be called spiritual? Only the one incorporeal Father is the spiritual Father, who also gives you teachings to become soul conscious. Only the one Father can be given the title "The Supreme". No one, apart from the Father, can be called "The Supreme". Essence for dharna: 1. Listen very well to what the Father says and imbibe it. Have an interest in relating it to others. Do not just hear it with one ear and let it out of the other. Never yawn at the time of earning an income. 2. Become Baba’s right hand and bring benefit to many others. Do the business of becoming Narayan and making others become Narayan from an ordinary human being. Blessing: May you be a special soul who reveals happiness on your face with a soul-conscious smile. The speciality of Brahmin life is happiness. Happiness means a soul conscious smile. Do not laugh loudly, but simply smile. Even if someone insults you, let there not be any waves of sorrow on your face; always remain happy. Do not think that the other person spoke for one hour and that you just said something for a second. Even to speak or think for a second means that unhappiness came on your face and you failed. You tolerated it for one hour and then the gas exploded from the gas balloon. Special souls who have the aim of an elevated life cannot become like a gas balloon. Slogan: Yogi souls with a cool bodies remain cool themselves and take others beyond with a glimpse of their cool drishti.

Sunday, October 19, 2014

Murli-20/10/2014-Hindi

20-10-14          प्रातः मुरली         ओम् शान्ति        “बापदादा”          मधुबन   “मीठे बच्चे - हियर नो ईविल.... यहां तुम सतसंग में बैठे हो, तुम्हें मायावी कुसंग में नहीं जाना है, कुसंग लगने से ही संशय के रूप में घुटके आते हैं”                                 प्रश्न:-    इस समय किसी भी मनुष्य को स्प्रीचुअल नहीं कह सकते हैं - क्यों? उत्तर:- क्योंकि सभी देह- अभिमानी हैं । देह- अभिमान वाले स्प्रीचुअल कैसे कहला सकते हैं । स्प्रीचुअल फादर तो एक ही निराकार बाप है जो तुम्हें भी देही- अभिमानी बनने की शिक्षा देते हैं । सुप्रीम का टाइटिल भी एक बाप को ही दे सकते हैं, बाप के सिवाए सुप्रीम कोई भी कहला नहीं सकते ।   ओम् शान्ति | बच्चे जब यहाँ बैठते हो तो जानते हो बाबा हमारा बाबा भी है, टीचर भी है और सतगुरू भी है । तीन की दरकार रहती है । पहले बाप फिर पढ़ाने वाला टीचर और फिर पिछाड़ी में गुरू । यहाँ याद भी ऐसे करना है क्योंकि नई बात है ना । बेहद का बाप भी है, बेहद का माना सबका । यहाँ जो भी आयेंगे कहेंगे यह स्मृति में लाओ । इसमें किसको संशय हो तो हाथ उठाओ । यह वन्डरफुल बात है ना । जन्म-जन्मान्तर कभी ऐसा कोई मिला होगा जिसको तुम बाप, टीचर, सतगुरू समझो । सो भी सुप्रीम । बेहद का बाप, बेहद का टीचर, बेहद का सतगुरू । ऐसा कभी कोई मिला? सिवाए इस पुरूषोत्तम संगमयुग के कभी मिल न सके । इसमें कोई को संशय हो तो हाथ उठावे । यहाँ सब निश्चय बुद्धि होकर बैठे हैं । मुख्य हैं ही यह तीन । बेहद का बाप नॉलेज भी बेहद की देते हैं । बेहद की नॉलेज तो यह एक ही है । हद की नॉलेज तो तुम अनेक पढ़ते आये हो । कोई वकील बनते हैं, कोई सर्जन बनते हैं क्योंकि यहाँ तो डॉक्टर, जज, वकील आदि सब चाहिए ना । वहाँ तो दरकार नहीं । वहाँ दु :ख की कोई बात ही नहीं । तो अब बाप बैठ बेहद की शिक्षा बच्चों को देते हैं । बेहद का बाप ही बेहद की शिक्षा देते हैं फिर आधाकल्प कोई शिक्षा तुमको पढ़ने की नहीं है । एक ही बार शिक्षा मिलती है जो 21 जन्मों के लिए फलीभूत होती है अर्थात् उनका फल मिलता है । वहाँ तो डॉक्टर, बैरिस्टर, जज आदि होते नहीं । यह तो निश्चय है ना । बराबर ऐसे हैं ना? वहाँ दु :ख होता नहीं । कर्मभोग होता नहीं । बाप कर्मों की गति बैठ समझाते हैं । वह गीता सुनाने वाले क्या ऐसे सुनाते हैं? बाप कहते हैं मैं तुम बच्चों को राजयोग सिखाता हूँ । उसमें तो लिख दिया है कृष्ण भगवानुवाच । परन्तु वह है दैवीगुणों वाला मनुष्य । शिवबाबा तो कोई नाम धरते नहीं । उनका दूसरा कोई नाम नहीं । बाप कहते हैं मैं यह शरीर लोन लेता हूँ । यह शरीर रूपी मकान हमारा नहीं है, यह भी इनका मकान है । खिड़कियाँ आदि सब हैं । तो बाप समझाते हैं मैं तुम्हारा बेहद का बाप अर्थात् सभी आत्माओं का बाप हूँ, पढ़ाता भी हूँ आत्माओं को । इनको कहा जाता है स्प्रीचुअल फादर अर्थात् रूहानी बाप और कोई को भी रूहानी बाप नहीं कहेंगे । यहाँ तुम बच्चे जानते हो यह बेहद का बाप है । अब स्प्रीचुअल कान्फ्रेन्स हो रही है । वास्तव में स्प्रीचुअल कान्फ्रेन्स तो है ही नहीं । वह तो सच्चे स्प्रीचुअल हैं नहीं । देह- अभिमानी हैं । बाप कहते हैं-बच्चे, देही- अभिमानी भव । देह का अभिमान छोड़ो । ऐसे थोड़ेही किसको कहेंगे । स्प्रीचुअल  अक्षर अभी डालते हैं । आगे सिर्फ रिलीजस कान्फ्रेन्स कहते थे । स्प्रीचुअल का कोई अर्थ नहीं समझते हैं । स्प्रीचुअल फादर अर्थात् निराकारी फादर । तुम आत्मायें हो स्प्रीचुअल बच्चे । स्प्रीचुअल फादर आकर तुमको पढ़ाते हैं । यह समझ और कोई में हो न सके । बाप खुद बैठ बतलाते हैं कि मैं कौन हूँ । गीता में यह नहीं है । मैं तुमको बेहद की शिक्षा देता हूँ । इसमें वकील, जज, सर्जन आदि की दरकार नहीं क्योंकि वहाँ तो एकदम सुख ही सुख है । दु :ख का नाम-निशान नहीं होता । यहाँ फिर सुख का नाम-निशान नहीं है, इसको कहा जाता हैं प्राय:लोप । सुख तो काग विष्टा समान है । जरा-सा सुख है तो बेहद सुख की नॉलेज दे कैसे सकते । पहले जब देवी-देवताओं का राज्य था तो सत्यता 100 प्रतिशत थी । अभी तो झूठ ही झूठ है । यह है बेहद की नॉलेज । तुम जानते हो यह मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ है, जिसका बीजरूप मैं हूँ । उनमें झाड़ की सारी नॉलेज है । मनुष्यों को यह नॉलेज नहीं है । मैं चैतन्य बीजरूप हूँ । मुझे कहते ही हैं ज्ञान का सागर । ज्ञान से सेकण्ड में गति-सद्गति होती हैं । मैं हूँ सबका बाप । मुझे पहचानने से तुम बच्चों को वर्सा मिल जाता है । परन्तु राजधानी है ना । स्वर्ग में भी मर्तबे तो नम्बरवार बहुत हैं । बाप एक ही पढ़ाई पढ़ाते हैं । पढ़ने वाले तो नम्बरवार ही होते हैं । इसमें फिर और कोई पढ़ाई की दरकार नहीं रहती । वहाँ कोई बीमार होता नहीं । पाई पैसे की कमाई के लिए पढ़ाई नहीं पढ़ते । तुम यहाँ से बेहद का वर्सा ले जाते हो । वहाँ यह मालूम नहीं पड़ेगा कि यह पद हमको कोई ने दिलाया है । यह तुम अभी समझते हो । हद की नॉलेज तो तुम पढ़ते आये हो । अब बेहद की नॉलेज पढ़ाने वाले को देख लिया, जान लिया । जानते हो बाप, बाप भी है, टीचर भी है, आकर हमको पढ़ाते हैं । सुप्रीम टीचर है, राजयोग सिखलाते हैं । सच्चा सतगुरू भी है । यह है बेहद का राजयोग । वह बैरिस्टरी, डॉक्टरी ही सिखलायेंगे क्योंकि यह दुनिया ही दु :ख की है । वह सब हैं हद की पढ़ाई, यह है बेहद की पढ़ाई । बाप तुमको बेहद की पढ़ाई पढ़ाते हैं । यह भी जानते हो यह बाप, टीचर, सतगुरू कल्प-कल्प आते हैं फिर यही पढ़ाई पढ़ाते हैं सतयुग-त्रेता के लिए । फिर प्राय :लोप हो जाता है । सुख की प्रालब्ध पूरी हो जाती है ड्रामा अनुसार । यह बेहद का बाप बैठ समझाते हैं, उनको ही पतित-पावन कहा जाता है । कृष्ण को त्वमेव माता च पिता वा पतित-पावन कहेंगे क्या? इनके मर्तबे और उनके मर्तबे में रात-दिन का फर्क है । अब बाप कहते हैं मुझे पहचानने से तुम सेकण्ड में जीवनमुक्ति पा सकते हो । अब कृष्ण भगवान् अगर होता तो कोई भी झट पहचान ले । कृष्ण का जन्म कोई दिव्य अलौकिक नहीं गाया हुआ है । सिर्फ पवित्रता से होता है । बाप तो कोई के गर्भ से नहीं निकलते हैं । समझाते हैं मीठे-मीठे रूहानी बच्चों, रूह ही पढ़ती है । सब संस्कार अच्छे वा बुरे रूह में रहते हैं । जैसे-जैसे कर्म करते हैं, उस अनुसार उन्हें शरीर मिलता है । कोई बहुत दु :ख भोगते हैं । कोई काने, कोई बहरे होते हैं । कहेंगे पास्ट में ऐसे कर्म किये हैं जिसका यह फल है । आत्मा के कर्मों अनुसार ही रोगी शरीर आदि मिलता है । अभी तुम बच्चे जानते हो-हमको पढ़ाने वाला है गॉड फादर । गॉड टीचर, गॉड प्रीसेप्टर है । उसको कहते हैं गॉड परम आत्मा । उसको मिलाकर परमात्मा कहते हैं, सुप्रीम सोल । ब्रह्मा को तो सुप्रीम नहीं कहेंगे । सुप्रीम अर्थात् ऊंच ते ऊंच, पवित्र ते पवित्र । मर्तबे तो हरेक के अलग- अलग हैं । कृष्ण का जो मर्तबा है वह दूसरे को मिल नहीं सकता । प्राइम मिनिस्टर का मर्तबा दूसरे को थोड़ेही देंगे । बाप का भी मर्तबा अलग है । ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी अलग है । ब्रह्मा, विष्णु, शंकर देवता है, शिव तो परमात्मा है । दोनों को मिलाकर शिव शंकर कैसे कहेंगे । दोनों अलग- अलग हैं ना । न समझने के कारण शिव शंकर को एक कह देते हैं । नाम भी ऐसे रख देते हैं । यह सब बातें बाप ही आकर समझाते हैं । तुम जानते हो यह बाबा भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है । हरेक मनुष्य को बाप भी होता है, टीचर भी होता है और गुरू भी होता है । जब बुढ़े होते हैं तो गुरू करते हैं । आजकल तो छोटेपन में ही गुरू करा देते हैं, समझते हैं अगर गुरू नहीं किया तो अवज्ञा हो जायेगी । आगे 60 वर्ष के बाद गुरू करते थे । वह होती है वानप्रस्थ अवस्था । निर्वाण अर्थात् वाणी से परे स्वीट साइलेन्स होम, जिसमें जाने के लिए आधाकल्प तुमने मेहनत की है । परन्तु पता ही नहीं तो कोई जा नहीं सकते । किसको रास्ता बता कैसे सकते । एक के सिवाए तो कोई रास्ता बता न सके । सबकी बुद्धि एक जैसी नहीं होती हैं । कोई तो जैसे कथायें सुनते हैं, फायदा कुछ नहीं । उन्नति कुछ नहीं । तुम अभी बगीचे के फूल बनते हो । फूल से कांटे बने, अब फिर कांटे से फूल बाप बनाते हैं । तुम ही पूज्य फिर पुजारी बने । 84 जन्म लेते-लेते सतोप्रधान से तमोप्रधान पतित बन गये । बाप ने सीढ़ी सारी समझाई है । अब फिर पतित से पावन कैसे बनते हैं, यह किसको भी पता नहीं । गाते भी हैं ना हे पतित-पावन आओ, आकर हमको पावन बनाओ फिर पानी की नदियाँ सागर आदि को पतित-पावन समझ क्यों जाकर स्नान करते हैं । गंगा को पतित-पावनी कह देते हैं । परन्तु नदियां भी कहाँ से निकली? सागर से ही निकलती हैं ना । यह सभी सागर की सन्तान हैं तो हरेक बात अच्छी रीति समझने की होती है । यहाँ तो तुम बच्चे सतसग में बैठे हो । बाहर कुसंग में जाते हो तो तुमको बहुत उल्टी बातें सुनायेंगे । फिर यह इतनी सब बातें भूल जायेगी । कुसंग में जाने से घुटका खाने लग पड़ते हैं, संशय का तब मालूम पड़ता है । परन्तु यह बातें तो भूलनी नहीं चाहिए । बाबा हमारा बेहद का बाबा भी है, टीचर भी है, पार भी ले जाते हैं, इस निश्चय से तुम आये हो । वह सभी हैं जिस्मानी लौकिक पढ़ाई, लौकिक भाषायें । यह है अलौकिक । बाप कहते हैं मेरा जन्म भी अलौकिक है । मैं लोन लेता हूँ । पुरानी जुत्ती लेता हूँ । सो भी पुराने ते पुरानी, सबसे पुरानी है यह जुत्ती । बाप ने जो लिया है, इसको लांग बूट कहते हैं । यह कितनी सहज बात है । यह तो कोई भूलने की नहीं है । परन्तु माया इतनी सहज बातें भी भुला देती है । बाप, बाप भी है, बेहद की शिक्षा देने वाला भी है, जो और कोई दे न सके । बाबा कहते हैं भल जाकर देखो कहाँ से मिलती है । सब हैं मनुष्य । वह तो यह नॉलेज दे न सके । भगवान एक ही रथ लेते हैं, जिसको भाग्यशाली रथ कहा जाता है, जिसमें बाप की प्रवेशता होती है, पदमापदम भाग्यशाली बनाने । बिल्कुल नजदीक का दाना है । ब्रह्मा सो विष्णु बनते हैं । शिवबाबा इनको भी बनाते हैं, तुमको भी इन द्वारा विश्व का मालिक बनाते हैं । विष्णु की पुरी स्थापन होती है । इसको कहा जाता है राजयोग, राजाई स्थापन करने लिए । अभी यहाँ सुन तो सब रहे हैं, परन्तु बाबा जानते हैं बहुतों के कानों से बह जाता है, कोई धारण कर और सुना सकते हैं । उनको कहा जाता है महारथी । सुनकर फिर धारण करते हैं, औरों को भी रूचि से समझाते हैं । महारथी समझाने वाला होगा तो झट समझेंगे, घोड़ेसवार से कम, प्यादे से और भी कम । यह तो बाप जानते हैं कौन महारथी हैं, कौन घोड़ेसवार हैं । अब इसमें मूँझने की तो बात ही नहीं । परन्तु बाबा देखते रहते हैं बच्चे मूँझते हैं फिर झुटके खाते रहते हैं । आखें बन्द कर बैठते हैं । कमाई में कभी झुटका आता है क्या? झुटका खाते रहेंगे तो फिर धारणा कैसे होगी । उबासी से बाबा समझ जाते हैं यह थका हुआ है । कमाई में कभी थकावट नहीं होती । उबासी है उदासी की निशानी । कोई न कोई बात के घुटके अन्दर खाते रहने वालों को उबासी बहुत आती है । अभी तुम बाप के घर में बैठे हो, तो परिवार भी है, टीचर भी बनते हैं, गुरू भी बनते हैं रास्ता बताने के लिए । मास्टर गुरू कहा जाता है । तो अब बाप का राइट हैंण्ड बनना चाहिए ना । जो बहुतों का कल्याण कर सकते हैं । धन्धे सभी में हैं नुकसान, बिगर धन्धे नर से नारायण बनने के । सभी की कमाई खत्म हो जाती है । नर से नारायण बनने का धन्धा बाप ही सिखलाते हैं । तो फिर कौन सी पढ़ाई पढ़नी चाहिए । जिनके पास धन बहुत है, वह समझते हैं स्वर्ग तो यहाँ ही है । बापू गांधी ने रामराज्य स्थापन किया? अरे, दुनिया तो यह पुरानी तमोप्रधान है ना और ही दु :ख बढ़ता जाता है, इनको रामराज्य कैसे कहेंगे । मनुष्य कितने बेसमझ बन पड़े हैं । बेसमझ को तमोप्रधान कहा जाता है । समझदार होते हैं सतोप्रधान । यह चक्र फिरता रहता है, इसमें कुछ भी बाप से पूछने का नहीं रहता । बाप का फर्ज है रचता और रचना की नॉलेज देना । वह तो देते रहते हैं । मुरली में सब समझाते रहते हैं । सभी बातों का रेसपॉन्ड मिल जाता है । बाकी पूछेंगे क्या? बाप के सिवाए कोई समझा ही नहीं सकते तो पूछ भी कैसे सकते । यह भी तुम बोर्ड पर लिख सकते हो एवरहेल्दी, एवरवेल्दी 21 जन्म के लिए बनना है तो आकर समझो । अच्छा! मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमोर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।   धारणा के लिए मुख्य सार:- 1. बाप जो सुनाते हैं उसे सुनकर अच्छी तरह धारण करना है । दूसरों को रूचि से सुनाना है । एक कान से सुन दूसरे से निकालना नहीं है । कमाई के समय कभी उबासी नहीं लेनी है ।   2. बाबा का राइट हैण्ड बन बहुतों का कल्याण करना है । नर से नारायण बनने और बनाने का धन्धा करना है ।   वरदान:- आत्मिक मुस्कराहट द्वारा चेहरे से प्रसन्नता की झलक दिखाने वाले विशेष आत्मा भव !     ब्राह्मण जीवन की विशेषता है प्रसन्नता । प्रसन्नता अर्थात् आत्मिक मुस्कराहट । जोर-जोर से हँसना नहीं, लेकिन मुस्कराना । चाहे कोई गाली भी दे रहे हो तो भी आपके चेहरे पर दु :ख की लहर नहीं आये, सदा प्रसन्नचित । यह नहीं सोचो कि उसने एक घण्टा बोला मैंने तो सिर्फ एक सेकण्ड बोला । सेकण्ड भी बोला या सोचा, शक्ल पर अप्रसन्नता आई तो फेल हो जायेंगे । एक घण्टा सहन किया फिर गुब्बारे से गैस निकल गई । श्रेष्ठ जीवन के लक्ष्य वाली विशेष आत्मा ऐसे गैस के गुब्बारे नहीं बनती ।   स्लोगन:-  शीतल काया वाले योगी स्वयं शीतल बन दूसरों को शीतल दृष्टि से निहाल करते हैं ।      ओम् शान्ति |  

Murli-19/10/2014-English

19/10/14 Madhuban Avyakt BapDada Om Shanti 28/12/78 The revelation of God is based on truth and truth is based on cleanliness and fearlessness. Blessing: May you be equal to Father Brahma and do everything with the balance of being royal and simple. Just as Father Brahma remained ordinary, neither too high nor too low, similarly, the discipline for Brahmins from the beginning until now has been to be neither completely simple nor too royal. They should be of a medium level. There are now many facilities and there are also people who give the facilities, but, nevertheless, when you carry out any task, let it be of a medium level. No one should say that there is a lot of splendour of royalty here. To the extent that you are simple, so too, remain royal: let there be a balance of the two. Slogan: Instead of looking at others, look at yourself and remember: Whatever I do, others who see me will do the same.

Saturday, October 18, 2014

Murli-19/10/2014-Hindi

19-10-14    प्रातः मुरली ओम् शान्ति  “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज:28-12-78   मधुबन   “परमात्म प्रत्यक्षता का आधार सत्यता और सत्यता का आधार स्वच्छता और निर्भयता” आज बापदादा सर्व बच्चों को शक्ति सेना वा पाण्डव सेना के रूप में देख रहे हैं । सेनापति अपनी सेना को देख हर्षित भी हो रहे हैं और साथ-साथ अपनी सेना के महारथी वा घोड़े सवार दोनों के कर्तव्य को देख रहे हैं - महारथी क्या कर रहे हैं, घोड़े सवार क्या कर रहे हैं! दोनों ही अपना- अपना पार्ट बजा रहे हैं । अब तक ड्रामा अनुसार जो भी हरेक ने पार्ट बजाया वह नम्बरवार अच्छा कहेंगे | लेकिन अब क्या करना है? महारथियों को अब अपनी कौन-सी महावीरता दिखानी है? बाप-दादा विशेष महावीरनियों और महावीरों की सेवा के पार्ट को देख रहे थे । अब तक सेवा के क्षेत्र में कहाँ तक पहुँचे हैं? जैसे स्थूल सेना का सेनापति नक्शे के आधार पर सदा देखते रहते हैं कि सेना कहाँ तक पहुँची है! कितनी एरिया के विजयी बने हैं? अस्त्र शस्त्र, बारुद अर्थात् सामग्री कहाँ तक स्टाक में जमा है? आगे क्या लक्ष्य है? लक्ष्य की मंज़िल से कहाँ तक दूर है? किस स्पीड से बढ़ते जा रहे हैं? वैसे आज बाप-दादा भी आदि से अब तक के सेवा के नक्शे को देख रहे थे । रिजल्ट क्या देखा? महावीर वा महावीरनियां सेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ते जा रहे हैं शस्त्र भी सब साथ में हैं, एरिया भी बढ़ाते जा रहे हैं, लेकिन अभी तक आत्मिक बाम्ब लगाया है, अभी परमात्म बाम्ब लगाना है । आत्मिक सुख वा आत्मिक शान्ति की अनुभूति, रुहानियत की अनुभूति के भिन्न-भिन्न शस्त्र नम्बरवार समय प्रमाण कार्य में लगाया है लेकिन लास्ट बाम्ब अर्थात् परमात्म बाम्ब है बाप की प्रत्यक्षता का । जो देखे, जो सम्पर्क में आ करके सुने, उनके द्वारा यह आवाज निकले कि बाप आ गये हैं । डायरेक्ट आलमाइटी अथॉरिटी का कर्तव्य चल रहा है । यह अन्तिम बाम्ब है जिससे चारों ओर से आवाज़ निकलेगा । अभी यह कार्य रहा हुआ है । यह कैसे होगा और कब होगा? परमात्म प्रत्यक्षता का आधार सत्यता है । सत्यता ही प्रत्यक्षता है । एक स्वयं के स्थिति की सत्यता, दूसरी सेवा की सत्यता । सत्यता का आधार है स्वच्छता और निर्भयता । इन दोनों धारणाओं के आधार से सत्यता द्वारा ही प्रत्यक्षता होगी । किसी भी प्रकार की अस्वच्छता अर्थात् ज़रा भी सच्चाई-सफाई की कमी है तो कर्तव्य की सिद्धि, प्रत्यक्षता हो नहीं सकती । सच्चाई और सफाई - सच्चाई अर्थात् मैं जो हूँ , जैसा हूँ - सदा उस ओरीजनल सतोप्रधान स्वरूप में स्थित रहना है । रजो और तमो स्टेज सच्चाई की ओरीजनल स्टेज नहीं । यह संगदोष की स्टेज है । किसका संग? माया अथवा रावण का । आत्मा की सत्यता सतोप्रधानता है । तो पहली यह सच्चाई है । दूसरी बात - बोल और कर्म में भी सच्चाई अर्थात् सत्यता की स्टेज सतोप्रधानता है वा अभी रजो और तमो मिक्स है? सत्यता नेचुरल संस्कार रूप में है वा पुरुषार्थ से सत्यता की स्टेज को लाना पड़ता है? जैसे बाप को ट्रुथ अर्थात् सत्य कहते हैं वैसे ही आत्मिक स्वरूप की वास्तविकता भी सत्य अर्थात ट्रुथ है । तो सत्यता सतोप्रधानता को कहा जाता है, ऐसी सच्चाई है? सफाई अर्थात् स्वच्छता । जरा भी संकल्प द्वारा भी अशुद्धि अर्थात् बुराई को वा अवगुण को टच किया वा धारण किया तो सम्पूर्ण सफाई नहीं कहेंगे । जैसे स्थूल में भी कोई प्रकार की गन्दगी को देखना भी अच्छा नहीं लगता, देखने से किनारा कर देंगे, ऐसे बुराई को सोचना भी बुराई को टच करना हुआ । सुनना और बोलना वा करना यह तो स्वयं ही बुराई को धारण करते हैं । सफाई अर्थात् स्वच्छता, संकल्प मात्र भी अशुद्धि न हो । इसको कहा जाता है सच्चाई और सफाई अर्थात् स्वच्छता । दूसरी बात है निर्भयता । निर्भयता की परिभाषा भी बड़ी गुह्य है । पहली बात - अपने पुराने तमोगुणी संस्कार पर विजयी बनने की निर्भयता । क्या करुँ, होता नहीं, संस्कार बहुत प्रबल हैं - यह भी निर्भयता नहीं । अन्य आत्माओं के सम्पर्क और सम्बन्ध में स्वयं के संस्कार मिलाना और अन्य के संस्कार परिवर्तन करना - इसमें भी निर्भयता हो । पता नहीं चल सकेंगे, निभा सकेंगे, मेरा मानेंगे वा नहीं मानेंगे इसमें भी अगर भयता है तो इसको सम्पूर्ण निर्भयता नहीं कहेंगे । तीसरी बात - विश्व की सेवा में अर्थात् सेवा के क्षेत्र में वायुमण्डल वा अन्य आत्माओं के सिद्धान्तों की परिपक्वता को देखते हुए संकल्प में भी उन्हों की परिपक्वता का या वातावरण, वायुमण्डल का प्रभाव पड़ना - यह भी भयता है । यह बिगड़ जायेंगे, हंगामा हो जायेगा, हलचल हो जायेगी इससे भी निर्भयता हो । जब आत्म ज्ञानी, आप तना द्वारा निकली हुई शाखाएं वह भी अपने अल्पज्ञ मान्यता में निर्भयता का प्रभाव डालती है, अपनी अल्प मत को प्रत्यक्ष करने में निर्भय होती है, झूठ को सच करके सिद्ध करने में अटल और अचल रहती है, तो सर्वज्ञ बाप के श्रेष्ठ मत वा अनादि आदि सत्य को प्रत्यक्ष करने में संकोच करना भी भय है । शाखाएं हिलने वाली होती हैं, तना अचल होता है तो शाखायें निर्भय हो और तना में संकोच के भय की हलचल हो तो इसको क्या कहेंगे? इसलिए जो प्रत्यक्षता का आधार स्वच्छता और निर्भयता है उसको चेक करो । इसी को ही सत्यता कहा जाता है । इस सत्यता के आधार पर ही प्रत्यक्षता है इसलिए अन्तिम पावरफुल बाम्ब परमात्म प्रत्यक्षता अब शुरु नहीं की है । अब तक की रिजल्ट में राजयोगी आत्माएं श्रेष्ठ हैं, राजयोग श्रेष्ठ है, कर्तव्य श्रेष्ठ है, परिवर्तन श्रेष्ठ है - यह प्रत्यक्ष हुआ है लेकिन सिखाने वाला डायरेक्ट आलमाइटी है, ज्ञान सूर्य साकार सृष्टि पर उदय हुआ है, यह अभी गुप्त है । परमात्म बाम्ब की रिजल्ट क्या होगी? विश्व की सर्व आत्माओं के अल्पकाल के सब सहारे समाप्त हो एक बाप का सहारा अनुभव होगा । जैसे साइन्स के बाम्ब द्वारा देश का देश समाप्त हो पहला दृश्य कुछ भी नजर नहीं आता, सब समाप्त हो जाता है ऐसे इस अन्तिम बाम्ब द्वारा सर्व अल्पकाल के साधना रूपी साधन समाप्त हो एक ही यथार्थ साधन राजयोग द्वारा हरेक के बीच बाप प्रत्यक्ष होगा । विश्व में विश्व पिता स्पष्ट दिखाई देगा । हर धर्म की आत्मा द्वारा एक ही बोल निकलेगा कि हमारा बाप, हिन्दुओं वा मुसलमानों का नहीं - सबका बाप । इसको कहा जाता है परमात्म बाम्ब द्वारा अन्तिम प्रत्यक्षता । अब रिजल्ट सुनी कि क्या कर रहे हैं और क्या करनाe3 है? अब के वर्ष परमात्म बाम्ब फेंको । स्वच्छता और निर्भयता के आधार से सत्यता द्वारा प्रत्यक्षता करो । अच्छा । ऐसे बाप को विश्व के आगे प्रत्यक्ष करने वाले, सदा निर्भय, सदा एक ही धुन में मस्त रहने वाले रमता सहज राजयोगी, अन्तिम समय को समीप लाने वाले अर्थात् सर्व आत्माओं की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले बाप समान दया वा रहम के सागर, ऐसे रहमदिल बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते । पार्टियों के साथ बातचीत: - सभी अपने श्रेष्ठ भाग्य के गुणगान करते हुए सदा खुशी में रहते हो? ऐसा श्रेष्ठ भाग्य जिसका गायन स्वयं भगवान करे, ऐसा भाग्य फिर कभी मिलेगा? भविष्य में भी ऐसा भाग्य नहीं होगा, अब नहीं तो कब नहीं, ऐसी खुशी होती है? भाग्य का सितारा सदैव चमकता रहे तो चमकती हुई चीज की तरफ स्वत: ही सबका अटेंशन जाता है, यह क्या है? ऐसे हरेक के मस्तक बीच भाग्य का सितारा सदैव चमकता रहे तो विश्व की नजर आटोमेटिकली जायेगी कि यह कौन से भाग्य का सितारा चमकता हुआ दिखाई दे रहा है । जैसे कोई विशेष सितारा विशेष रूप से चमकता है तो आटोमेटिक सबका अटेंशन जाता है, ऐसे भाग्य का सितारा सबको आकर्षित करे । ऐसा चमकता हुआ सितारा स्वयं को भी दिखाई दे और विश्व को भी । चमकती हुई चीज न चाहते भी, नजर घुमाते भी दिखाई देती है, तो भले चारों तरफ नजर घुमायें लेकिन आखिर में आपके तरफ ही नजर आएगी, ऐसा चमकता हुआ भाग्य अनुभव होता है? इस समय की ऊंची स्थिति की रिजल्ट सारे कल्प में ऊंचे इस समय की ऊंची स्थिति वाले उच्च पद पाने वाले होंगे, विश्व में पूज्य के रूप में भी ऊंचे होंगे, बाप के बच्चे भी ऊंचे, भक्ति में भी ऊंचे और ज्ञान में भी ऊंचा राज्य करने में भी ऊंच होंगे । हर पार्ट ऊँचा बजाने कारण, ऊंचे ते ऊंची आत्मा अनुभव करेंगे ।   वरदान:- रॉयल और सिम्पल दोनों के बैलेन्स से कार्य करने वाले ब्रह्मा बाप समान भव !      जैसे ब्रह्मा बाप साधारण रहे, न बहुत ऊंचा न बहुत नींचा । ब्राह्मणों का आदि से अब तक का नियम है कि न बिल्कुल सादा हो, न बहुत रॉयल हो । बीच का होना चाहिए । अभी साधन बहुत हैं, साधन देने वाले भी हैं फिर भी कोई भी कार्य करो तो बीच का करो । ऐसा कोई न कहे कि यहाँ तो राजाई ठाठ हो गया है । जितना सिम्पल उतना रायॅल - दोनों का बैलेन्स हो ।   स्लोगन:-  दूसरों को देखने के बजाए स्वयं को देखो और याद रखो - ''जो कर्म हम करेंगे हमें देख और करेंगे'' ।      ओम् शान्ति |  

Murli-18/10/2014-English

Essence: Sweet children, the Father has come here as the Boatman to remove the boats of all of you from the ocean of poison and to take you to the ocean of milk. You now have to go from this side to the other side. Question: While observing the part of each one, why can you children not defame anyone? Answer: Because you know that this drama is eternally predestined. Each actor is playing his own part within it. No one can be blamed for anything. This path of devotion has to be passed through again. There cannot be the slightest change in that. Question: In which two words is the knowledge of the whole cycle merged? Answer: Today and tomorrow. Yesterday, we were in the golden age. Today, having been around the cycle of 84 births, we have reached hell and, tomorrow, we will go to heaven again. Essence for dharna: 1. This tree has now become old and decayed. Souls now have to return home. Therefore, free yourself from all bondages and make yourself light. Remove everything here from your intellect. 2. While keeping the eternal drama in your intellect, do not defame any actor. Understand the secrets of the drama and become the masters of the world. Blessing: May you be a true server who serves while detached from any selfish motives and is loving in relationships. Any service you do that disturbs yourself or others is not service, but selfishness. It is when there is any type of selfish motive that there is fluctuation. When your own selfish motive or the selfish motives of others are not fulfilled, there is then disturbance in service. Therefore, serve while detached from any selfish motives and are loving in all your relationships and you will be said to be a true server. Do service with a lot of zeal and enthusiasm, but the burden of service should never make your stage fluctuate. Pay attention to this. Slogan: With your pure and elevated vibrations, change a negative scene into a positive one.

Friday, October 17, 2014

Murli-18/10/2014-Hindi

18-10-14          प्रातः मुरली         ओम् शान्ति        “बापदादा”          मधुबन   “मीठे बच्चे - बाप खिवैया बन आया है तुम सबकी नईया को विषय सागर से निकाल क्षीर सागर में ले जाने, अभी तुमको इस पार से उस पार जाना है”                                 प्रश्न:-    तुम बच्चे हर एक का पार्ट देखते हुए किसकी भी निंदा नहीं कर सकते हो - क्यों? उत्तर:- क्योंकि तुम जानते हो यह अनादि बना-बनाया ड्रामा है, इसमें हर एक एक्टर अपना- अपना पार्ट बजा रहे हैं । किसी का भी कोई दोष नहीं है । यह भक्ति मार्ग भी फिर से पास होना है, इसमें जरा भी चेन्ज नहीं हो सकती ।   प्रश्न:-    किन दो शब्दों में सारे चक्र का ज्ञान समाया हुआ है? उत्तर:- आज और कल । कल हम सतयुग में थे, आज 84 जन्मों का चक्र लगाकर नर्क में पहुँचे, कल फिर स्वर्ग में जायेंगे ।   ओम् शान्ति | अब बच्चे सामने बैठे हैं, जहाँ से आते हैं वहाँ अपने सेन्टर्स पर जब रहते हैं तो वहाँ ऐसे नहीं समझेंगे कि हम ऊंच ते ऊंच बाबा के सम्मुख बैठे हैं । वही हमारा टीचर भी है, वही हमारी नईया को पार लगाने वाला है, जिसको ही गुरू कहते हैं । यहाँ तुम समझते हो हम सम्मुख बैठे हैं, हमको इस विषय सागर से निकाल क्षीर सागर में ले जाते हैं । पार ले जाने वाला बाप भी सम्मुख बैठा है, वह एक ही शिव बाप की आत्मा है, जिसको ही सुप्रीम अथवा ऊंच ते ऊंच भगवान् कहा जाता है । अभी तुम बच्चे समझते हो हम ऊंच ते ऊंच भगवान् शिवबाबा के सामने बैठे हैं । वह इसमें (ब्रह्मा तन में) बैठे हैं, वह तुमको पार भी पहुँचाते हैं । उनको रथ भी जरूर चाहिए ना । नहीं तो श्रीमत कैसे दें । अभी तुम बच्चों को निश्चय हैं  - बाबा हमारा बाबा भी है, टीचर भी है, पार ले जाने वाला भी है । अभी हम आत्मायें अपने घर शान्तिधाम में जाने वाली हैं । वह बाबा हमको रास्ता बता रहे हैं । वहाँ सेन्टर्स पर बैठने और यहाँ सम्मुख बैठने में रात-दिन का फर्क है । वहाँ ऐसे नहीं समझेंगे कि हम सम्मुख बैठे हैं । यहाँ यह महसूसता आती है । अभी हम पुरूषार्थ कर रहे हैं । पुरूषार्थ कराने वाले को खुशी रहेगी । अभी हम पावन बनकर घर जा रहे हैं । जैसे नाटक के एक्टर्स होते हैं तो समझते हैं अब नाटक पूरा हुआ । अभी बाप आये हैं हम आत्माओं को ले जाने । यह भी समझाते हैं तुम घर कैसे जा सकते हो, वह बाप भी है, नईया को पार करने वाला खिवैया भी है । वह लोग भल गाते हैं परन्तु समझते कुछ भी नहीं हैं कि नईया किसको कहा जाता है, क्या वह शरीर को ले जायेगा? अभी तुम बच्चे जानते हो हमारी आत्मा को पार ले जाते हैं । अभी आत्मा इस शरीर के साथ वेश्यालय में विषय वैतरणी नदी में पड़ी है । हम असल रहवासी शान्तिधाम के थे, हमको पार ले जाने वाला अर्थात् घर ले जाने वाला बाप मिला है । तुम्हारी राजधानी थी जो माया रावण ने सारी छीन ली है । वह राजधानी फिर जरूर लेनी है । बेहद का बाप कहते हैं-बच्चों, अब अपने घर को याद करो । वहां जाकर फिर क्षीरसागर में आना है । यहाँ है विष का सागर, वहाँ है क्षीर का सागर और मूलवतन है शान्ति का सागर । तीनों धाम हैं । यह तो है दु :खधाम । बाप समझाते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो । कहने वाला कौन है, किस द्वारा कहते हैं? सारा दिन ' मीठे-मीठे बच्चे' कहते रहते हैं । अभी आत्मा पतित है, जिस कारण फिर शरीर भी ऐसा मिलेगा । अभी तुम समझते हो हम पक्के-पक्के सोने के जेवर थे फिर खाद पड़ते-पड़ते झूठे बन गये हैं । अब वह झूठ कैसे निकले, इसलिए यह याद के यात्रा की भट्ठी है । अग्नि में सोना पक्का होता है ना । बाप बार-बार समझाते हैं, यह समझानी जो तुमको देता हूँ, हर कल्प देता आया हूँ । हमारा पार्ट हैं फिर 5 हजार वर्ष के बाद आकर कहता हूँ कि बच्चे पावन बनो । सतयुग में भी तुम्हारी आत्मा पावन थी, शान्तिधाम में भी पावन आत्मा रहती है । वह तो है हमारा घर । कितना स्वीट घर है । जहाँ जाने के लिए मनुष्य कितना माथा मारते हैं । बाप समझाते हैं अभी सबको जाना है फिर पार्ट बजाने के लिए आना है । यह तो बच्चों ने समझा है । बच्चे जब दु :खी होते हैं तो कहते हैं-हे भगवान, हमें अपने पास बुलाओ । हमको यहाँ दु :ख में क्यों छोड़ा हैं । जानते हैं बाप परमधाम में रहते हैं । तो कहते हैं-हे भगवान, हमको परमधाम में बुलाओ । सतयुग में ऐसे नहीं कहेगें । वहाँ तो सुख ही सुख है । यहाँ अनेक दु :ख हैं तब पुकारते हैं-हे भगवान! आत्मा को याद रहती है । परन्तु भगवान को जानते बिल्कुल नहीं हैं । अभी तुम बच्चों को बाप का परिचय मिला है । बाप रहते ही हैं परमधाम में । घर को ही याद करते हैं । ऐसे कभी नहीं कहेंगे राजधानी में बुलाओ । राजधानी के लिए कभी नहीं कहेंगे । बाप तो राजधानी में रहते भी नहीं । वह रहते ही हैं शान्तिधाम में । सब शान्ति मांगते हैं । परमधाम में भगवान के पास तो जरूर शान्ति ही होगी, जिसको मुक्तिधाम कहा जाता है । वह है आत्माओं के रहने का स्थान, जहाँ से आत्मायें आती हैं । सतयुग को घर नहीं कहेंगे, वह है राजधानी । अब तुम कहाँ-कहाँ से आये हो । यहाँ आकर सम्मुख बैठे हो । बाप 'बच्चे-बच्चे' कह बात करते हैं । बाप के रूप में बच्चे-बच्चे भी कहते हैं फिर टीचर बन सृष्टि के आदि-मध्य- अन्त का राज अथवा हिस्ट्री-जॉग्राफी समझाते हैं । यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं । तुम बच्चे जानते हो मूलवतन है हम आत्माओं का घर । सूक्षवतन तो है ही दिव्य दृष्टि की बात । बाकी सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग तो यहाँ ही होता है । पार्ट भी तुम यहाँ बजाते हो । सूक्ष्मवतन का कोई पार्ट नहीं । यह साक्षात्कार की बात है । कल और आज, यह तो अच्छी रीति बुद्धि में होना चाहिए । कल हम सतयुग में थे फिर 84 जन्म लेते-लेते आज नर्क में आ गये हैं । बाप को बुलाते भी नर्क में हैं । सतयुग में तो अथाह सुख है, तो कोई बुलाते ही नहीं । यहाँ तुम शरीर में हो तब बात करते हो । बाप भी कहते हैं मैं जानी जाननहार हूँ अर्थात् सृष्टि के आदि-मध्य- अन्त को जानता हूँ । परन्तु सुनाऊं कैसे! विचार की बात है ना इसलिए लिखा हुआ है-बाप रथ लेते हैं । कहते हैं मेरा जन्म तुम्हारे सदृश्य नहीं है । मैं इसमें प्रवेश करता हूँ । रथ का भी परिचय देते हैं । यह आत्मा भी नाम-रूप धारण करते-करते तमोप्रधान बनी है । इस समय सब छोरे हैं, क्योंकि बाप को जानते नहीं हैं । तो सब छोरे और छोरियाँ हो गये । आपस में लड़ते हैं तो कहते हैं ना-छोरे-छोरियां लड़ते क्यों हो! तो बाप कहते हैं मुझे तो सब भूल गये हैं । आत्मा ही कहती है छोरे-छोरियां । लौकिक बाप भी ऐसे कहते हैं, बेहद का बाप भी कहते हैं छोरे-छोरियां यह हाल क्यों हुआ है? कोई धनी धोणी है? तुमको बेहद का बाप जो स्वर्ग का मालिक बनाते हैं, जिसको तुम आधाकल्प से पुकारते आये हो, उनके लिए कहते हो ठिक्कर भित्तर में हैं । बाप अब सम्मुख बैठ समझाते हैं । अभी तुम बच्चे समझते हो हम बाबा के पास आये हैं । यह बाबा ही हमको पढ़ाते हैं । हमारी नईया पार करते हैं क्योंकि यह नईया बहुत पुरानी हो गई है । तो कहते हैं इनको पार लगाओ फिर हमको नई दो । पुरानी नईया खौफनाक होती है । कहाँ रास्ते में टूट पड़े, एक्सीडेंट हो जाए । तो तुम कहते हो हमारी नईया पुरानी हो गई है, अब हमें नई दो । इनको वस्त्र भी कहते हैं, नईया भी कहते हैं । बच्चे कहते बाबा हमको तो ऐसे (लक्ष्मी-नारायण जैसे) वस्त्र चाहिए । बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, स्वर्गवासी बनने चाहते हो? हर 5 हजार वर्ष बाद तुम्हारे यह कपड़े पुराने होते हैं फिर नया देता हूँ । यह है आसुरी चोला । आत्मा भी आसुरी है । मनुष्य गरीब होगा तो कपड़े भी गरीबी के पहनेंगे । साहूकार होगा तो कपड़े भी साहूकारी के पहनेंगे । यह बातें अभी तुम जानते हो । यहाँ तुमको नशा चढ़ता है हम किसके सामने बैठे हैं । सेन्टर्स पर बैठते हो तो वहाँ तुमको यह भासना नहीं आयेगी । यहाँ सम्मुख होने से खुशी होती है क्योंकि बाप डायरेक्ट बैठ समझाते हैं । वहाँ कोई समझायेगा तो बुद्धियोग कहाँ-कहाँ भागता रहेगा । कहते हैं ना-गोरखधन्धे में फंसे रहते हैं । फुर्सत कहाँ मिलती है । मैं तुमको समझा रहा हूँ । तुम भी समझते हो-बाबा इस मुख द्वारा हमको समझाते हैं । इस मुख की भी कितनी महिमा हैं । गऊमुख से अमृत पीने के लिए कहाँ-कहाँ जाकर धक्के खाते हैं । कितनी मेहनत से जाते हैं । मनुष्य समझते ही नहीं हैं कि यह गऊमुख क्या है? कितने बड़े समझदार मनुष्य वहाँ जाते हैं, इसमें फायदा क्या? और ही टाइम वेस्ट होता है । बाबा कहते हैं यह सूर्यास्त आदि क्या देखेंगे । फायदा तो इनमें कुछ नहीं । फायदा होता ही है पढ़ाई में । गीता में पढ़ाई हैं ना । गीता में कोई भी हठयोग आदि की बात नहीं । उसमें तो राजयोग हैं । तुम आते भी हो राजाई लेने के लिए । तुम जानते हो इस आसुरी दुनिया में तो कितने लड़ाई-झगड़े आदि हैं । बाबा तो हमको योगबल से पावन बनाए विश्व का मालिक बना देते हैं । देवियों को हथियार दे दिये हैं परन्तु वास्तव में इसमें हथियारों आदि की कोई बात है नहीं । काली को देखो कितना भयानक बनाया है । यह सब अपने- अपने मन की भ्रान्तियों से बैठ बनाया है । देवियां कोई ऐसी 4 - 8 भुजाओं वाली थोड़ेही होंगी । यह सब भक्ति मार्ग है । सो बाप समझाते हैं - यह एक बेहद का नाटक हैं । इसमें कोई की निंदा आदि की बात नहीं । अनादि ड्रामा बना हुआ है । इसमें फर्क कुछ भी पड़ता नहीं है । ज्ञान किसको कहा जाता, भक्ति किसको कहा जाता, यह बाप समझाते हैं । भक्ति मार्ग से फिर भी तुमको पास करना पड़ेगा । ऐसे ही तुम 84 का चक्र लगाते-लगाते नीचे आयेंगे । यह अनादि बना-बनाया बड़ा अच्छा नाटक है जो बाप समझाते हैं । इस ड्रामा के राज को समझने से तुम विश्व के मालिक बन जाते हो । वन्डर है ना! भक्ति कैसे चलती है, ज्ञान कैसे चलता है, यह खेल अनादि बना हुआ है । इसमें कुछ भी चेन्ज नहीं हो सकता । वह तो कह देते ब्रह्म में लीन हो गया, ज्योति ज्योत समाया, यह संकल्प की दुनिया है, जिसको जो आता है वह कहते रहते हैं । यह तो बना-बनाया खेल है । मनुष्य बाइसकोप देखकर आते हैं । क्या उसको संकल्प का खेल कहेंगे? बाप बैठ समझाते हैं-बच्चे, यह बेहद का नाटक है जो हूबहू रिपीट होगा । बाप ही आकर यह नॉलेज देते हैं क्योंकि वह नॉलेजफुल है । मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, चैतन्य है, उनको ही सारी नॉलेज है । मनुष्यों ने तो लाखों वर्ष आयु दिखा दी है । बाप कहते हैं इतनी आयु थोड़ेही हो सकती है । बाइसकोप लाखों वर्ष का हो तो कोई की बुद्धि में नहीं बैठे । तुम तो सारा वर्णन करते हो । लाखों वर्ष की बात कैसे वर्णन करेंगे । तो वह सब है भक्ति मार्ग । तुमने ही भक्ति मार्ग का पार्ट बजाया । ऐसे-ऐसे दुःख भोगते- भोगते अब अन्त में आ गये हो । सारा झाड़ जड़जड़ीभूत अवस्था को पाया हुआ है । अब वहाँ जाना है । अपने को हल्का कर दो । इसने भी हल्का कर दिया ना । तो सब बन्धन टूट जायें । नहीं तो बच्चे, धन, कारखाने, ग्राहक, राजे, रजवाड़े आदि याद आते रहेंगे । धन्धा ही छोड़ दिया तो फिर याद क्यों आयेंगे । यहाँ तो सब कुछ भूलना है । इनको भूल अपने घर और राजधानी को याद करना है । शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना है । शान्तिधाम से फिर हमको यहाँ आना पड़े । बाप कहते हैं मुझे याद करो, इनको ही योग अग्नि कहा जाता हैं । यह राजयोग है ना । तुम राजऋषि हो । ऋषि पवित्र को कहा जाता है । तुम पवित्र बनते हो राजाई के लिए । बाप ही तुम्हें सब सत्य बताते हैं । तुम भी समझते हो यह नाटक है । सब एक्टर्स यहाँ जरूर होने चाहिए । फिर बाप सबको ले जायेंगे । यह ईश्वर की बरात है ना । वहाँ बाप और बच्चे रहते हैं फिर यहाँ आते हैं पार्ट बजाने । बाप तो सदैव वहाँ रहते हैं । मुझे याद ही दुःख में करते हैं । वहाँ फिर मैं क्या करूँगा । तुमको शान्तिधाम, सुखधाम में भेजा बाकी क्या चाहिए! तुम सुखधाम में थे बाकी सब आत्मायें शान्तिधाम में थी फिर नम्बरवार आते गये । नाटक आकर पूरा हुआ । बाप कहते हैं-बच्चे, अब गफलत मत करो । पावन तो जरूर बनना है । बाप कहते हैं यह वही ड्रामा अनुसार पार्ट बज रहा है । तुम्हारे लिए ड्रामा अनुसार मैं कल्प-कल्प आता हूँ । नई दुनिया में अब चलना है ना । अच्छा ! मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमोर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।   धारणा के लिए मुख्य सार:- 1. अब यह झाड़ पुराना जड़जड़ीभूत हो गया है, आत्मा को वापस घर जाना है इसलिए अपने को सब बन्धनों से मुक्त कर हल्का बना लेना है । यहाँ का सब कुछ बुद्धि से भूल जाना है ।   2. अनादि ड्रामा को बुद्धि में रख किसी भी पार्टधारी की निंदा नहीं करनी है । ड्रामा के राज को समझ विश्व का मालिक बनना है ।   वरदान:- स्वार्थ से न्यारे और संबंधों में प्यारे बन सेवा करने वाले सच्चे सेवाधारी भव !     जो सेवा स्वयं को वा दूसरों को डिस्टर्व करे वो सेवा नहीं है, स्वार्थ है । निमित्त कोई न कोई स्वार्थ होता है तब नीचे ऊपर होते हो । चाहे अपना चाहे दूसरे का स्वार्थ जब पूरा नहीं होता है तब सेवा में डिस्ट्रबेन्स होती है इसलिए स्वार्थ से न्यारे और सर्व के सम्बन्ध में प्यारे बनकर सेवा करो तब कहेंगे सच्चे सेवाधारी । सेवा खूब उमंग-उत्साह से करो लेकिन सेवा का बोझ स्थिति को कभी नीचे-ऊपर न करे, यह अटेंशन रखो ।   स्लोगन:-  शुभ वा श्रेष्ठ वायब्रेशन द्वारा निगेटिव सीन को भी पॉजिटिव में बदल दो ।      ओम् शान्ति |  

Murli-17/10/2014-English

Essence: Sweet children, to stay in remembrance of the one Father alone is unadulterated remembrance. It is by having 
this remembrance that your sins can be cut away.

Question: What is the reason why some are easily able to accept the things that the Father explains whereas others find 
it difficult?
Answer: The children who have performed devotion for a long time, who have been the old devotees of half the cycle, 
are easily able to accept everything that the Father says because they receive the fruit of their devotion. Those who are 
not old devotees find it difficult to understand everything. Those of other religions are not even able to understand this 
knowledge.

Essence for dharna: 

1. Become soul conscious and watch each one's part as a detached observer in this eternally, imperishable, predestined 
drama. Remember your sweet home and your sweet kingdom. Remove this old world from your intellect. 

2. Do not be defeated by Maya. Make effort for your soul to become pure by burning your sins away in the fire of remembrance.

Blessing: May you be an easy yogi and set your mind and intellect in their seat with the power of determination. 

Children have love for the Father and this is why they pay a lot of attention to sitting, walking and doing service in 
powerful remembrance. However, if there isn’t complete control over your mind, if your mind is not in order, you sit 
properly for a short time and you then begin to fidget. Sometimes you are set and sometimes you become upset. However, 
with the power of concentration and the power of determination, set your mind and intellect in a seat of a constant and 
stable stage and you will become an easy yogi.

Slogan: Use whatever powers there are at the time of need and you will have many very good experiences.