Monday, December 18, 2017

19/12/17 प्रात:मुरली

19/12/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - कोई कितना भी गुणवान हो, मीठा हो, धनवान हो तुम्हें उसकी तरफ आकर्षित नहीं होना है, जिस्म को याद नहीं करना है''
प्रश्न:
जिन बच्चों को नॉलेज मिली है उनके मुख से बाप के प्रति कौन से मीठे बोल निकलते हैं?
उत्तर:
ओहो! बाबा आपने तो हमें जीयदान दे दिया। मीठे बाबा आपने हमें सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज देकर, सर्व दु:खों से छुड़ा दिया तो कितनी शुक्रिया निकलनी चाहिए।
प्रश्न:
अन्त के समय बाप के सिवाए किसी में भी रग न जाए उसके लिए क्या करना है?
उत्तर:
बाबा कहे बच्चे - कोई भी चीज़ लोभ के वश अपने पास एक्स्ट्रा नहीं रखनी है। एक्स्ट्रा रखेंगे तो उसमें रग जायेगी। बाप की याद भूल जायेगी।
गीत:-
धीरज धर मनुवा.....  
ओम् शान्ति।
बच्चों को धीरज कौन दे रहा है? बच्चों की बुद्धि झट बेहद के बाप तरफ चली जाती है। सो भी सिर्फ इस समय ही तुम बच्चों की बुद्धि जाती है। यूँ तो बेहद बाप की तरफ बहुतों की बुद्धि जाती है। परन्तु उन्हों को ये मालूम ही नहीं है कि यह संगमयुग है। बाप आया हुआ है, सबको एक ही बार पता तो नहीं पड़ सकता। बच्चे बाप का बनें तो मालूम पड़े। अब तुम बच्चों ने बाप को जाना है। जानते हो बाबा आया हुआ है। बेहद का वर्सा दे रहे हैं, जो 5 हजार वर्ष पहले तुमको दिया था। वह आते ही हैं बच्चों को बेहद स्वर्ग का वर्सा देने। वह बेहद का बाप होते हुए फिर पढ़ाते भी हैं। भगवान यानि बाप फिर भगवानुवाच अर्थात् पढ़ाते हैं। पढ़ाते क्या हैं? वह भी तुम बच्चे समझते हो। हम बाप के सम्मुख बैठे हैं। बाबा कोई शास्त्र तो पढ़ा हुआ नहीं है। यह दादा पढ़ा हुआ है। उनको कहा ही जाता है ज्ञान का सागर, आलमाइटी अथॉरिटी। खुद भी कहते हैं मैं सभी वेदों, शास्त्रों आदि को अच्छी रीति जानता हूँ - यह सब भक्ति मार्ग की सामग्री हैं। यह मेरे रचे हुए नहीं हैं। पूछा जाता है यह शास्त्र कब से पढ़ते आये हो? तो कहते हैं यह परम्परा से चला आया है। बाप कहते हैं मेरे को तो कोई पढ़ाने वाला नहीं है। न मेरा कोई बाप है और सब गर्भ में प्रवेश करते हैं, माता की परवरिश लेते हैं। मैं तो गर्भ में आता ही नहीं हूँ, जो माता की परवरिश लूँ। मनुष्य की आत्मा गर्भ में जाती है। सतयुग के लक्ष्मी-नारायण ने भी तो गर्भ से जन्म लिया। तो वह भी मनुष्य ठहरे। मैं तो इस शरीर में आकर प्रवेश करता हूँ, ड्रामा प्लैन अनुसार कल्प पहले मुआफिक। यह अक्षर और कोई जानते नहीं। कल्प की आयु का ही किसको पता नहीं है। बाप ही बैठ समझाते हैं मैं तुम्हारा बाप भी हूँ, शिक्षक भी हूँ, सतगुरू भी हूँ। तुम जानते हो यह बाबा मिलकियत देने वाला है। बाबा स्वर्ग की बादशाही देने आया है। नर्क की राजाई थोड़ेही देंगे! यह बुद्धि में रहना चाहिए कि बेहद का बाप हमको राजयोग सिखला रहे हैं। बाप स्वर्ग की स्थापना करने वाला है। कहते हैं मेरी मत पर चलो, मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। फिर द्वापर से तुम रावण की मत पर चलते हो। सतयुग में तो कोई मनुष्य की मत गति सद्गति के लिए मिलती नहीं। न दरकार है। कलियुग में सब गति सद्गति के लिए मत मांगते हैं। जानते हैं हम कोई समय स्वर्ग में थे, पावन थे, तब तो पुकारते हैं - हे पतित-पावन, हे सद्गति दाता हमको सद्गति दो। सतयुग में यह रड़ी नहीं मारी जाती। अब तुम जानते हो बाबा आया हुआ है। बहुत सरलता से राजयोग और सहज ज्ञान की मत देते हैं। उनकी श्रीमत है। ऊंचे ते ऊंचा है भगवान। उनसे ऊंचा कोई है नहीं, और वह हमारा रूहानी बाप है। रूहानी फादर होने के कारण वह रूहों को ही ज्ञान देते हैं, जिस्मानी फादर होने से बच्चे जिस्मानी नॉलेज उठाते हैं इसलिए बाप कहते हैं - आत्म-अभिमानी बनो और बाप को याद करो। कोई भी जिस्मानी याद नहीं रहनी चाहिए। तुम आत्मा हो, मनुष्य भल कितना भी अच्छा हो, धनवान हो, मीठा हो तो भी देहधारी को याद नहीं करना। एक परमपिता परमात्मा को ही याद करना। कोई साहूकार का बच्चा होगा तो बाप को ही याद करेगा। गाँधी को वा शास्त्री आदि को थोड़ेही याद करेगा। सबसे जास्ती याद परमपिता परमात्मा को करते हैं फिर कोई लक्ष्मी-नारायण को, कोई राधे-कृष्ण को भी करते हैं। समझते हैं यह होकर गये हैं। उन्हों की हिस्ट्री-जॉग्राफी भी है। ऊंचे ते ऊंचा है बाप, वह फिर आयेगा, जरूर वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होगी। कलियुग के बाद फिर सतयुग आयेगा। परन्तु यह सिवाए तुम बच्चों के और किसको भी मालूम नहीं। सिर्फ कहने मात्र कहते हैं - हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट। समझते कुछ भी नहीं। पहले तुम भी ऐसे थे। समझते थे बरोबर लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, परन्तु कितना समय चला, क्या हुआ फिर वह कहाँ चले गये, कुछ भी पता नहीं था। अभी भी नम्बरवार अच्छी रीति धारण कर श्रीमत पर चलते हो - यह भी ठीक है। मन्सा-वाचा-कर्मणा मदद देते हैं। ज्ञान और योग की मदद से बहुतों का कल्याण करेंगे।
तुम शक्ति सेना डबल अहिंसक हो। तुम्हारे में कोई भी हिंसा नहीं है। तुम किसको भी दु:ख नहीं देते हो। हिंसा अर्थात् दु:ख देना। घूंसा मारना, तलवार चलाना वा काम कटारी चलाना - यह सब दु:ख देना है। तुम कोई भी प्रकार का दु:ख नहीं देते हो इसलिए अहिंसा परमोधर्म कहा जाता है। मनुष्य तो सब हिंसा करते हैं। है ही रावण राज्य। मनुष्यों ने तो श्रीकृष्ण के चरित्रों में भी हिंसा दिखा दी है। तुम बच्चे जानते हो श्रीकृष्ण तो राजकुमार था, उनके ऐसे चरित्र वा जीवन कहानी की बात नहीं। चरित्र हैं ही ईश्वर के। वही रत्नागर, सौदागर, ज्ञान का सागर, जादूगर है। अरे, निराकार परमात्मा फिर सौदा कैसे करेगा? सौदागर तो मनुष्य होगा ना। इन सब बातों को तुम जानते हो तो कैसे सौदागर और रत्नागर है। उनको सब क्यों याद करते हैं? हे पतित-पावन, सर्व के सद्गति दाता, दु:ख हर्ता सुखकर्ता। महिमा भी एक की है। यह महिमा न तो सूक्ष्मवतन वासी, न स्थूलवतन वासी की हो सकती है। यह महिमा है मूलवतनवासी की। ऊंचे ते ऊंच है बाप, हम आत्मायें उनके बच्चे हैं। हम सब नम्बरवार पार्ट बजाने आते हैं। बाप कहते हैं - यह जो नॉलेज तुमको सुनाता हूँ - वह प्राय:लोप हो जाती है। वह गीतायें तो ढेर हैं। फिर भी पुरानी गीतायें निकलेंगी। तुम्हारे कागज थोड़ेही निकलेंगे। गीता बहुत भाषाओं में हैं। ऊंचे ते ऊंची गीता है परन्तु सब बनाई है मनुष्यों ने, यथार्थ तो है नहीं इसलिए सब अन्धेरे में हैं, तब गाया जाता है ज्ञान सूर्य प्रगटा... इस सूर्य की महिमा नहीं। ज्ञान सूर्य की महिमा है। यह सूर्य धूप देता, सागर पानी देता, उनके नाम इन पर, इनके नाम उन पर लगा दिये हैं। ज्ञान सागर को ही ज्ञान सूर्य कहते हैं। तुम जानते हो हमारा अन्धियारा अब दूर हो गया है। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को तुम ही जानते हो। जब रचयिता के पार्ट को जानते हो तो औरों के पार्ट को भी जरूर जानते होंगे। तुमको नॉलेज मिल रही है। तुम जानते हो यह बाबा बहुत प्यारा है। हमको जीयदान देते हैं। दु:ख से छुड़ाते हैं। काल के चम्बे से छुड़ाते हैं। कोई मरने से बच जाते हैं - कहते हैं डाक्टर ने जीयदान दिया। तुमको तो एक ही बार ऐसा जीयदान मिलता है - जो तुम कभी बीमार नहीं होंगे, फिर यह नहीं कहना पड़ेगा कि फलाने ने जीयदान दिया। यह है बिल्कुल नई बात।
अभी तुम जीते जी बाप के बने हो। कोई-कोई को फिर माया रावण अपनी तरफ खींच लेती है। उसे कहेंगे रावण रूपी काल खा गया। ईश्वरीय गोद में आकर फिर बदलकर आसुरी गोद में चले जाते हैं। काल ने नहीं खाया परन्तु जीते जी ईश्वर के बने, फिर जीते जी रावण के बन पड़ते हैं। यहाँ धर्मात्मा बने फिर वहाँ जाकर अधर्मी बन जाते हैं। यहाँ संगम पर धर्म का राज्य है, वहाँ अधर्म का राज्य है। सतयुग में है ही एक धर्म। कलियुग में है अधर्म का राज्य, कौरव राज्य। पाण्डवों के साथ कहते हैं कृष्ण था। तुम्हारे साथ तो शिवबाबा है। जुआ की बात नहीं। राजाई न कौरवों की है, ना पाण्डवों की है। बाप आकर धर्म का राज्य स्थापन करते हैं। चाहते भी हैं रामराज्य हो। हम स्वर्गवासी बने अर्थात् यह नर्क है। परन्तु किसको सीधा नर्कवासी कहें तो बिगड़ पड़ते हैं। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। बेहद का बाप निराकार है। बेहद के बाप को ही भगवान कहा जाता है। हद के बाप को भगवान थोड़ेही कहेंगे। कृष्ण को थोड़ेही ज्ञान सागर, पतित-पावन कहेंगे। उनकी महिमा सिर्फ तुम ब्राह्मण जानते हो। तुमको बाप आकर आप समान बनाते हैं। बाप भी जानते हैं, तुम बच्चे भी जान जाते हो, वर्सा मिल जाता है। जैसेकि लौकिक बाप से बच्चों को वर्सा मिलता है। वह तो अलग-अलग है। यहाँ तुम समझते हो हम बेहद के बाप से वर्सा पा रहे हैं। ऐसा कोई स्कूल वा सतसंग होगा नहीं, जहाँ सब कहें हम बेहद के बाप से वर्सा लेने आये हैं। यहाँ बाप राजयोग सिखलाते हैं। कहते हैं तुम नर से नारायण बनेंगे। सो जरूर संगमयुग अर्थात् कलियुग अन्त और सतयुग आदि का संगम होगा तब तो तुम पुरुषार्थ कर नर से नारायण बनेंगे। यह राजयोग हम बाबा से सीख रहे हैं - नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनने के लिए। नर-नारायण का मन्दिर भी बनाते हैं। उनको 4 भुजायें देते हैं क्योंकि साथ में हैं। नारी लक्ष्मी का फिर मन्दिर नहीं है। नारी लक्ष्मी को दीपमाला पर बुलाते हैं। उनको महालक्ष्मी कहते हैं। तुम लक्ष्मी की मूर्ति 4 भुजाओं के सिवाए नहीं देखेंगे। जिसको पूजते हैं, यह युगल विष्णु का रूप है, इसलिए 4 भुजायें दी हैं। यह सब बातें बाप ही समझाते हैं। मनुष्य तो कुछ जानते नहीं। भगवान को ढूँढते रहते हैं। धक्का खाते रहते हैं। भगवान तो है ही ऊपर फिर ढूंढने की क्या दरकार है। मन्दिर में जो कृष्ण का चित्र है वह चित्र घर में रख क्यों नहीं पूजते? खास मन्दिर में ही क्यों जाते हैं? मन्दिर में जायेंगे, पैसे रखेंगे, दान करेंगे। घर में दान किसको करेंगे? तो यह सब भक्ति मार्ग की रस्में हैं। बाप कहते हैं तुमको कोई भी चित्र रखने की दरकार नहीं। क्या तुम शिवबाबा को नहीं जानते हो जो चित्र रखते हो? क्या चित्र रखने से याद कर सकते हो? बाबा जीता है फिर बच्चे चित्र क्यों रखेंगे? बाप तुमको ज्ञान दे रहा है फिर चित्र क्या करेंगे? बूढ़े हैं याद भूल जाती है इसलिए चित्र दिया जाता है। बाकी और कोई भी देहधारी को याद करते रहेंगे तो अन्त समय वही याद आयेगा। कुछ न कुछ रग है तो वह तुम्हारे पीछे पड़ेगा। फिर भल कितने भी शिवबाबा के चित्र रखो। अगर रग और तरफ होगी तो वह याद जरूर आयेगा इसलिए बाप कहते हैं बच्चे पूरा नष्टोमोहा हो जाओ। किसी भी चीज़ में मोह होगा, 2-4 जोड़ी जूते होंगे तो वह याद आयेंगे इसलिए कहा जाता है ज्यादा कोई भी वस्तुएं नहीं रखो। नहीं तो बुद्धि उसमें जायेगी। सिवाए बाप के और कोई को याद न करो। लोभ होता है ना - हम अच्छे-अच्छे वस्त्र रखें, 2-4 जूते रखें, घड़ी रखें। थोड़े पैसे रखें। रखेंगे तो वह याद आयेगा। बाबा को मालूम होना चाहिए - तुम्हारे पास क्या रखा है। वास्तव में तुमको कुछ भी रखना नहीं है, जो मिलता है वही रखना है। एक बाप के सिवाए और कुछ भी याद न रहे। इतनी प्रैक्टिस करनी है - तब ही विश्व के मालिक बनेंगे। यह कोई नहीं समझते कि राधे-कृष्ण विश्व के मालिक थे, सिर्फ कहते हैं भारत में राज्य करके गये हैं। जमुना के कण्ठे पर इनके महल थे। परन्तु वह सारे विश्व के मालिक थे। यह सिर्फ तुम्हारी बुद्धि में है। बेहद का बाप बेहद का मालिक बनाने आया है। प्रजा और राजा में फ़र्क बहुत है। यहाँ तुम नर से नारायण बनने आये हो तो पूरा फालो करो। फकीर से अमीर बनना है। इतना पुरुषार्थ करना चाहिए। खुशी से पढ़ना चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) ज्ञान-योग से सबको मदद करनी है। डबल अहिंसक बनना है। किसी को भी दु:ख नहीं देना है।
2) नष्टोमोहा बनना है। किसी भी चीज़ में बुद्धि की रग नहीं रखनी है। एक बाप की याद सदा रहे- इसकी प्रैक्टिस करनी है।
वरदान:
दिव्य बुद्धि द्वारा त्रिकालदर्शी स्थिति का अनुभव करने वाले सफलतामूर्त भव!
ब्राह्मण जन्म की विशेष सौगात दिव्य बुद्धि है। इस दिव्य बुद्धि द्वारा बाप को, अपने आपको और तीनों कालों को स्पष्ट जान सकते हो। दिव्य बुद्धि से ही याद द्वारा सर्व शक्तियों को धारण कर सकते हो। दिव्य बुद्धि त्रिकालदर्शी स्थिति का अनुभव कराती है, उनके सामने तीनों ही काल स्पष्ट होते हैं। कहा भी जाता है जो सोचो, जो बोलो, आगे पीछे का सोच समझकर करो। परिणाम को जानकर कर्म करने से सफलता अवश्य होती है।
स्लोगन:
यथार्थ निर्णय देना है तो रूहानी फखुर (नशे) द्वारा बेफिक्र स्थिति में स्थित रहो।
 

Sunday, December 17, 2017

18/12/17MorningMurli

18/12/17 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban

Sweet children, you are studying a very high study with the unlimited Father. It is in your intellects that you are the students of the Purifier, God, the Father, and that you are studying for the new world.
Question:
Which children receive a prize from the spiritual Government ?
Answer:
Those who make the effort to make many others equal to themselves. Those who give the proof of service are given a very big prize by the spiritual Government. They claim a right to an elevated status for the future 21 births.
Om Shanti
The Father says to the children: You sweet, sweet children are studying this study with Me. This study is for the new world. No one else can say that they are studying for the new world. The better you study, the more your reward for 21 births accumulates. You are studying the unlimited study with the unlimited Father. This is a very elevated, unlimited study. All the rest are studying studies worth a few pennies. The more effort you make in this unlimited study, the higher the status you will claim. These things should always remain in your intellects: We are the students of the Purifier, God the Father, and we are studying for the new world. Therefore, you should make such good effort to study: We will first go to the Father and then, according to how we individually study, we will go and claim a status in the new world. That is a worldly study whereas this is the parlokik (spiritual) study, that is, it is the study for the world beyond. This is the old, impure world. You know that you are changing from residents of hell into residents of heaven. You should repeatedly remember this because only then will happiness rise in your intellects. When children go to weddings etc. they forget. You must never forget the study. In fact, you should be even happier that you are becoming the masters of heaven for the future 21 births. Those who make many others equal to themselves will definitely claim a high status. These secrets cannot sit in the intellect of anyone else. Sense is required for doing service. There are different departments. Baba even says to those who create slides that the slides should be of one size and that they should be compatible with any projector. The first slide should be: What is your relationship with the Supreme Father, the Supreme Soul? They would then understand that the Supreme Father, the Supreme Soul is their Father. What inheritance you will get from Him? Then show that you receive a sun-dynasty status through Trimurti Brahma. You are also making effort for the new world. You are now at the confluence age and are creating the pure world. Your intellects have now remembered that 5000 years ago we truly become deities and that we then lost our kingdom. All the kingdoms that they claim now are limited matters. Yours is an unlimited battle. According to shrimat, you are now battling with Ravan, the five vices. You know that the part s of victory and defeat are fixed in the drama. The drama cycle turns every 5000 years. Therefore, you children have to follow shrimat, according to whatever directions each of you receives. Some children say that they are able to understand but unable to explain to others. That is like saying that you haven't understood anything. You will claim a status according to how much you yourself have understood. Let the discus of self-realisation continue to spin in your intellects. You become spinners of the discus of self-realisation. If you don't make others equal to yourselves, you are not serviceable. Therefore, you should make full effort. You also have to teach others. Brahmin teachers have to make effort with everyone. It is only when teachers make a lot of effort that they receive a prize. You receive a prize from a very great Government. You have to give the proof of service. You mustn't make mistakes. Here, you study all the subjects in the one class. You know that in the future you will go and become deities. Destruction definitely has to take place. Just as you built the buildings of heaven in the previous cycle, so you will do the same again. The drama also helps. There, they build huge palaces and huge thrones. Here, there aren't such big palaces of gold and silver. There, the diamonds and jewels will be like stones. There are so many diamonds and jewels in devotion, so what wouldn't they have at the beginning of the golden age? Wealthy people decorate the idols of Radhe and Krishna and Lakshmi and Narayan etc. so much. They decorate them with gold jewellery. Baba remembers a merchant who said that he was building a temple to Lakshmi and Narayan and that he wanted new jewellery for those idols. At that time, everything was very cheap. Therefore, what would it be in the golden age? There were many treasures on the path of devotion which were looted by everyone. You children now know everything. This is a very elevated study. You also have to teach it to young children. Together with a worldly education, this education should also be given. Continue to remind others of Shiv Baba. Explain the pictures. Also benefit your children. Shiv Baba is the Creator of heaven. If you remember Shiv Baba, you become the masters of heaven. The imperishable knowledge is never destroyed. When others are given even a little of this knowledge they will come into the kingdom. In the golden age it was the kingdom of Lakshmi and Narayan. Where did it then go? We are explaining to you, which means that we will make you into masters of that heaven. By you teaching it to them, they will learn. You have to make effort. You mustn’t waste time in useless matters. By making mistakes you will have to repent a great deal. A father earns wealth and then leaves it to the children. Now, everyone is to be destroyed. Even now, there continues to be so much fighting and battling and death continues to take place. This is nothing. There will be destruction in the region of tens of millions. Everything will be burnt and finished. It has to become a graveyard and it will then become the land of angels. The graveyard is big whereas the land of angels will be small. Those of Islam speak of how everyone will be buried. Khuda (God) comes and awakens everyone and then takes everyone back. At this time, all souls exist in one form or another. The bodies are in the graveyard, but the souls go and take other bodies. At this time, Maya has put everyone in the graveyard; all are dead. Everyone is to be destroyed and you must therefore not attach your heart to anyone. You must attach your heart to only the One. Eventually, all your attachment will finish. You have to remember the one Father, that is all! You understand that you are studying this study with the Purifier Father for your future 21 births. The Supreme Father, the Supreme Soul, is the Seed of the World, He is Living. The soul is also living. Until a soul enters a body, the body is non-living, but the soul is living. The soul has now received knowledge. Each soul has his own part recorded in himself. Each one’s act is individual. The drama is wonderful. It is said to be the wonder of nature. Such a huge part is recorded in such a tiny soul! The Supreme Spirit sits here and explains to you these spiritual matters which are all fixed in the drama. He also takes you on a tour. He continues to give you visions of everything which is fixed in the drama. Although the play is eternally predestined, human beings do not know that it is eternal. You know everything. Whatever happens, after a second, it becomes the past. You understand that whatever becomes the past was in the drama. The Father has explained to you what parts there were from the golden age onwards. The world does not know these things. The Father says: I am giving you the knowledge that I have in My intellect. I make you equal to Myself. You know that the whole world is corrupt. You now first have to become pure and then make others pure. Apart from you, no one can make anyone pure. You now have to follow the Father’s shrimat and imbibe divine virtues. You have to speak very sweetly. No bitter words should emerge from your lips. Have mercy on everyone. You can teach everyone the versions of God: “Manmanabhav”. They don’t know who God is or when He spoke the Gita. You now understand that God’s versions are: Become bodiless. Renounce all the bodily religions: I belong to Islam, I am a Parsi: who says this? All souls are brothers, children of the one Father. Souls explain to their brothers that the Father says: Constantly remember Me alone and you will go to the land of liberation. Everyone is to go to the land of nirvana. You have to remember these two words and explain them. The God of everyone is One. It cannot be Krishna. The Father says: Now renounce all the religions of the body and constantly remember Me alone. A soul takes support of matter and plays a part here. It is said of Christ, that he is now in the form of a beggar. Everyone’s shoe (body) is now old. Christ too must definitely have taken rebirth; he would now be in his last birth. The Father comes and awakens even these messengers. It is only the one Father who purifies the impure. Everyone definitely has to come down while taking rebirth. It is now the end of the iron age. As you progress further, people will accept this. The sound will emerge that the Father has come. God’s name is mentioned in the great war, but they changed the name. Destruction and establishment are the tasks of God alone. The Father Himself comes and opens the gates to heaven. You call out to Him: Baba, come! Come and open the gates to Paradise! The Father comes and opens the gates through you. Your name is glorified as the Shiv Shakti Army. Why are you called Pandavas? Because you are spiritual guides and you show everyone the path to heaven. The Father sits here and explains the essence of all the scriptures. Only those who understood these things in the previous cycle will do so again. We souls are guides and we will take everyone to the land of peace and then they have to go to the land of happiness. The land of sorrow has to be destroyed. There is the great Mahabharat War for that. You have all the detail in your intellects. “Manmanabhav, madhyajibhav” – the total knowledge is included in this. Just as Baba is k nowledge-full, so you children also become the same. Baba just keeps with Himself the key to divine vision. Instead of this, I make you into the masters of the world. I do not become that. There is this difference. The part of divine vision is also useful for you. God gives the return of your faith and devotion in the form of chick peas. Baba has explained how so many melas take place to Jagadamba. There aren’t so many melas to Lakshmi. There is so much difference! People place a picture of Lakshmi in their treasure-box with the hope that they will receive wealth. On the path of devotion, you receive chick peas whereas in knowledge, you receive diamonds. People simply ask for wealth from Lakshmi. They would not ask her for a child or for good health. People go to Jagadamba with all their desires. You now understand that you were worthy of worship and have now become worshippers and that you will then become worthy of worship. You children have now been enlightened with knowledge. You have become so unique. When the Satguru gives the ointment of knowledge, all the darkness is dispelled. You now know the beginning, the middle and the end of the drama. It has entered your intellects how you should value this study so much! You have been studying those studies for birth after birth and what did you receive? Chick peas. By studying this study for one birth, you receive diamonds and jewels. It is the duty of you children to make effort. What can the Teacher do if you don't study? It is not a question of mercy here. The whole kingdom of the deities is being established at the confluence age. You are having your sins absolved with the power of yoga and with the power of knowledge, that is, through knowledge you are becoming so elevated. By bathing in the Ocean of Knowledge and in the rivers of knowledge you receive salvation. You children continue to receive methods with which to explain to others. According to the drama plan, Baba continues to explain to you the things He explained in the previous cycle. Children continue to come here, numberwise. The Brahmin clan has to grow. You children have to become great donors. Continue to explain something or other to anyone who comes. You also have to blow the conch shell. You cannot imbibe as much at home as you can imbibe here. Madhuban has been praised in the scriptures as the place where the flute (murli) is played. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.
Essence for Dharna:
1) Have a lot of value for this study. You mustn’t ask the Father for mercy etc. Continue to accumulate the powers of knowledge and yoga.
2) Be merciful. Never let bitter words emerge through your lips. Always speak sweetly. Definitely do the service of making others equal to yourself.
Blessing:
May you be a master bestower of happiness who becomes an embodiment of happiness and gives everyone happiness.
To be aconfluence-aged Brahmin means to have no name or trace of sorrow because the children of the Bestower of Happiness are master bestowers of happiness. How can those who are master bestowers of happiness and embodiments of happiness experience sorrow themselves? They have stepped away in their intellects from the land of sorrow. They themselves are embodiments of happiness, and so they constantly give happiness to others. Just as the Father constantly gives happiness to every soul, so whatever is the Father’s task is also the task of the children. Even if someone is causing sorrow, you cannot cause sorrow. Your slogan is: Do not cause sorrow, do not accept sorrow.
Slogan:
Imbibe the balance of being cheerful and mature (serious) and remain in a constant and stable stage.
 

18/12/17 प्रात:मुरली

18/12/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - बेहद के बाप से तुम बहुत ऊंची पढ़ाई पढ़ रहे हो, बुद्धि में है पतित-पावन गॉड फादर के हम स्टूडेन्ट हैं, नई दुनिया के लिए पढ़ रहे हैं''
प्रश्न:
रूहानी गवर्मेन्ट से इज़ाफा किन बच्चों को मिलता है?
उत्तर:
जो बहुतों को आप समान बनाने की मेहनत करते हैं। सर्विस का सबूत निकालते हैं उन्हें रूहानी गवर्मेन्ट बहुत बड़ा इज़ाफा देती है। वह भविष्य 21 जन्मों के लिए ऊंच पद के अधिकारी बनते हैं।
ओम् शान्ति।
बाप कहते हैं बच्चों को कि मेरे द्वारा तुम मीठे-मीठे बच्चे पढ़ाई पढ़ रहे हो। यह पढ़ाई है ही नई दुनिया के लिए और कोई ऐसा कह न सके कि हम नई दुनिया के लिए पढ़ रहे हैं। जितना अच्छी रीति पढ़ेंगे उतनी प्रालब्ध 21 जन्मों के लिए तुम्हारी जमा हो जायेगी। बेहद के बाप से बेहद की पढ़ाई पढ़ रहे हैं। यह बेहद की बहुत ऊंची पढ़ाई है। बाकी तो सब पाई-पैसे की पढ़ाई है। तो इस बेहद की पढ़ाई में जितना तुम पुरुषार्थ करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। तुम्हारी बुद्धि में सदैव यह बातें रहनी चाहिए कि हम पतित-पावन गॉड फादर के स्टूडेन्ट हैं और नई दुनिया के लिए पढ़ रहे हैं तो तुमको कितना अच्छा पुरुषार्थ करना चाहिए कि हम पढ़कर पहले बाबुल के पास जायेंगे फिर अपनी-अपनी पढ़ाई अनुसार जाकर नई दुनिया में पद पायेंगे। वह है लौकिक पढ़ाई, यह है पारलौकिक पढ़ाई अर्थात् परलोक के लिए पढ़ाई। यह तो पुराना पतित लोक है। तुम जानते हो हम नर्कवासी से स्वर्गवासी बन रहे हैं। यह घड़ी-घड़ी याद पड़ना चाहिए तब तुम्हारे दिमाग में खुशी चढ़ेगी। शादी आदि में जाने से बहुत बच्चे भूल जाते हैं। पढ़ाई कभी भूलना नहीं चाहिए और ही खुशी रहनी चाहिए। हम भविष्य 21 जन्मों के लिए स्वर्ग के मालिक बनते हैं। जो अच्छी तरह बहुतों को आप समान बनाते हैं, वह फिर जरूर ऊंच पद पायेंगे। यह राज़ और कोई की बुद्धि में बैठ न सके। सर्विस करने का भी अक्ल होता है। डिपार्टमेंट अलग-अलग होती हैं। स्लाइड बनाने वालों को भी बाबा कहते हैं कि स्लाइड एक ही साइज़ में हो जो कोई भी प्रोजेक्टर में चल सके। पहले-पहले स्लाइड हो परमपिता परमात्मा से तुम्हारा क्या सम्बन्ध है? तो वह समझ जायें कि परमपिता परमात्मा हमारा बाप है। उनसे वर्सा क्या मिलता है? फिर दिखाना है त्रिमूर्ति ब्रह्मा द्वारा हमको यह सूर्यवंशी पद मिलता है। तुम भी पुरुषार्थ कर रहे हो नई दुनिया के लिए। अभी तुम हो संगम पर, पावन दुनिया बनाते हो। तुम्हारी बुद्धि में अब स्मृति आ गई है। बरोबर हम 5 हजार वर्ष पहले देवी-देवता थे। फिर राज्य गँवाया। बाकी यह राजाई आदि लेते हैं। वह सब हद की बातें हैं। तुम्हारी है बेहद की लड़ाई, श्रीमत पर तुम 5 विकार रूपी रावण के साथ लड़ते हो। तुम जानते हो ड्रामा में हार जीत का पार्ट है। हर 5 हजार वर्ष के बाद यह ड्रामा का चक्र फिरता है। तो अब तुम बच्चों को श्रीमत पर चलना पड़े, जिसको जो डायरेक्शन मिले। बच्चे कहते हैं हम समझते हैं परन्तु किसको समझा नहीं सकते। यह तो ऐसे हुआ जैसे समझा नहीं है। जितना खुद समझा हुआ है उतना ही पद पायेंगे। बुद्धि में स्वदर्शन चक्र फिरता ही रहे। स्वदर्शन चक्रधारी तुम बनते हो। दूसरे को अगर आप समान नहीं बनाया तो सर्विसएबुल नहीं ठहरे, इसलिए पूरा पुरुषार्थ करना चाहिए। औरों को भी सिखाना है। ब्राह्मणियों को हर एक के ऊपर मेहनत करनी है। टीचर्स बहुत मेहनत करती हैं तब तो इज़ाफा मिलता है। तुमको तो बहुत बड़ी गवर्मेंन्ट से इज़ाफा मिलता है। सर्विस का सबूत निकालना है। ग़फलत नहीं करनी चाहिए। यहाँ एक क्लास में हर प्रकार की पढ़ाई होती है। तुम जानते हो हम भविष्य में जाकर देवी-देवता बनेंगे। विनाश भी जरूर होना है। जैसे कल्प पहले स्वर्ग में मकान आदि बनाये थे वही फिर बनायेंगे। ड्रामा मदद करते हैं। वहाँ तो बड़े-बड़े महल बड़े-बड़े तख्त बनाते हैं। यहाँ थोड़ेही इतने बड़े महल सोने-चाँदी आदि के हैं। वहाँ तो हीरे-जवाहरात पत्थरों के मिसल होंगे। भक्ति में ही इतने हीरे-जवाहरात होते हैं तो सतयुग आदि में क्या नहीं होगा। भल करके साहूकार लोग यहाँ राधे-कृष्ण अथवा लक्ष्मी-नारायण आदि को सजाते हैं। सोने के जेवर आदि पहनाते हैं। बाबा को याद है - एक सेठ था उसने बोला लक्ष्मी-नारायण का मन्दिर बनाता हूँ, उसके लिए नये जेवर बनाने हैं। उस समय तो बहुत सस्ताई थी। तो सतयुग में क्या होगा। भक्ति मार्ग में बहुत माल थे, जो सब लूटकर ले गये। अब तुम बच्चों को सारा मालूम पड़ गया है। यह पढ़ाई है बहुत ऊंची। छोटे-छोटे बच्चों को भी सिखलाना चाहिए। राजविद्या के साथ यह भी विद्या देते रहो। शिवबाबा की याद दिलाते रहो। चित्रों पर समझाओ। बच्चों का भी कल्याण करो। शिवबाबा स्वर्ग का रचयिता है। तुम शिवबाबा को याद करेंगे तो स्वर्ग के मालिक बनेंगे। अविनाशी ज्ञान का विनाश तो होता नहीं है। थोड़ा भी सुनाने से राजधानी में आ जायेंगे। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। वह फिर कहाँ गया? हम तुमको समझाते हैं गोया तुमको उस स्वर्ग के मालिक बना देंगे। सिखाने से सीख जायेंगे, मेहनत करनी है। फालतू बातों में टाइम वेस्ट नहीं करना चाहिए। ग़फलत करने से बहुत पछतायेंगे। बाप धन कमाकर बच्चों को देकर जाते हैं। अभी तो सबका विनाश होना है। अभी भी कितने लड़ाई-झगड़े मौत आदि होते रहते हैं। यह कुछ नहीं है। अभी करोड़ों की अन्दाज़ में विनाश होगा, सब जल मर खत्म हो जाने हैं। कब्रिस्तान बनना है तब फिर परिस्तान बनेगा। कब्रिस्तान तो बड़ा है परिस्तान तो छोटा होगा। मुसलमान भी कहते हैं सब कब्रदाखिल हैं। खुदा आकर सबको जगाते हैं और वापिस ले जाते हैं। इस समय सब आत्मायें कोई न कोई रूप में हैं। कब्र में शरीर पड़ा है, बाकी आत्मा जाकर दूसरा शरीर लेती है। इस समय माया ने सबको कब्रदाखिल कर रखा है। सब मरे पड़े हैं। खत्म होने वाले हैं इसलिए किसी से दिल नहीं लगानी है। दिल लगानी है एक के साथ। आखरीन में तुम्हारा सबसे ममत्व मिट जायेगा। एक बाप को याद करना है बस। तुम समझते हो हम यह पढ़ाई भविष्य 21 जन्मों के लिए पतित-पावन बाप के द्वारा पढ़ रहे हैं। परमपिता परमात्मा मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, चैतन्य है। आत्मा भी चैतन्य है। जब तक आत्मा शरीर में न आये तो शरीर जड़ है। आत्मा ही चैतन्य है। अभी आत्मा को ज्ञान मिला है। हर एक आत्मा में अपना-अपना पार्ट नूँधा हुआ है। हर एक की एक्ट अपनी-अपनी है। वन्डरफुल ड्रामा है, इसको कुदरत कहा जाता है। इतनी छोटी सी आत्मा में कितना पार्ट नूँधा हुआ है। यह रूहानी बातें जो सुप्रीम रूह बैठ तुमको समझाते हैं। सैर कराते हैं, यह भी ड्रामा बना हुआ है, जो ड्रामा में नूँध है, उसका साक्षात्कार कराते रहते हैं। भल खेल पहले से ही अनादि बना हुआ है परन्तु मनुष्य नहीं जानते यह अनादि है। तुम तो सब कुछ जानते हो। जो कुछ होता है, एक सेकण्ड के बाद वह पास्ट हो जायेगा। जो पास्ट हो जाता है, तुम समझते हो यह ड्रामा में था। बाप ने समझाया है - सतयुग से लेकर क्या-क्या पार्ट हुआ है। यह बातें दुनिया नहीं जानती। बाप कहते हैं मेरी बुद्धि में जो नॉलेज है, वह तुमको दे रहा हूँ। तुमको भी आप समान बनाता हूँ। यह तो जानते हो सारी दुनिया भ्रष्टाचारी है। अब पहले-पहले पावन बनना और बनाना है। तुम्हारे सिवाए कोई पवित्र बना न सके।
अब बाप की श्रीमत पर चल दैवीगुण धारण करने हैं। बहुत मीठा बोलना है। कोई भी कड़ुआ बोल न निकले। सब पर रहम करना है। तुम सबको सिखला सकते हो - भगवानुवाच मनमनाभव। उनको यह पता नहीं है कि भगवान कौन है और उसने कब गीता सुनाई। तुम अभी समझते हो भगवानुवाच - अशरीरी बनो। देह के सब धर्म, मैं मुसलमान हूँ, पारसी हूँ, यह सब छोड़ दो। यह कौन कहते हैं? आत्मायें तो सभी आपस में भाई-भाई हैं। एक बाप के बच्चे हैं। आत्मायें अपने भाईयों को समझाती हैं कि बाप कहते हैं मामेकम् याद करो तो तुम मुक्तिधाम में जायेंगे। सब निर्वाणधाम जाने वाले हैं। दो अक्षर भी याद कर समझाना चाहिए। भगवान सबका एक है। कृष्ण तो हो न सके। अब बाप कहते हैं देह के सभी धर्म त्याग मामेकम् याद करो। आत्मा प्रकृति का आधार लेकर यहाँ पार्ट बजाती है। क्राइस्ट के लिए भी कहते हैं कि अभी वह बेगर है। सभी की पुरानी जुत्ती है। क्राइस्ट ने भी जरूर पुनर्जन्म लिया होगा। अभी तो लास्ट जन्म में होगा। इन मैसेन्जर्स को भी बाप ही आकर जगाते हैं। पतितों को पावन बनाने वाला एक ही बाप है। सभी को पुनर्जन्म लेते-लेते नीचे आना ही है। अभी कलियुग का अन्त है। आगे चलकर यह भी मानेंगे। आवाज निकलेगा कि बाप आया हुआ है। महाभारी लड़ाई में भगवान का नाम है ना। परन्तु नाम बदली कर दिया है। विनाश और स्थापना यह तो भगवान का ही काम है। बाप ही आकर स्वर्ग के द्वार खोलेंगे। तुम बुलाते हो बाबा आओ, आकर वैकुण्ठ का द्वार खोलो। तुम्हारे द्वारा बाप आकर द्वार खोलते हैं। तुम्हारा नाम बाला है - शिव शक्ति सेना। तुमको पाण्डव क्यों कहते हैं क्योंकि तुम रूहानी पण्डे हो, स्वर्ग का रास्ता बताते हो। बाप बैठ सभी शास्त्रों का सार बताते हैं। इन बातों को समझेंगे वही जिन्होंने कल्प पहले समझा है। हम आत्मायें पण्डे हैं सबको शान्तिधाम में ले जायेंगे फिर सुखधाम में आना है। दु:खधाम का विनाश होना है - इसके लिए यह महाभारत लड़ाई है। तुम्हारी बुद्धि में सारी डिटेल है। मनमनाभव, मध्याजीभव इनमें सारा ज्ञान आ जाता है। जैसे बाबा नॉलेजफुल है, तुम बच्चे भी बनते हो। सिर्फ दिव्य दृष्टि की चाबी मैं अपने पास रखता हूँ। इसके बदले फिर तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। मैं नहीं बनता हूँ। यह फ़र्क रहता है। दिव्य दृष्टि का पार्ट भी तुम्हारे काम में आता है। भावना के भूगरे (चने) दे देते हैं। बाबा ने समझाया है - जगत अम्बा का कितना मेला लगता है। लक्ष्मी का इतना मेला नहीं लगता। कितना फ़र्क है। लक्ष्मी के चित्र को तिजोरी में रखते हैं कि धन मिलेगा। भक्ति मार्ग में मिलते हैं भूगरे (चने) ज्ञान में मिलते हैं हीरे। लक्ष्मी से सिर्फ धन मांगते हैं। उनको ऐसे नहीं कहेंगे कि बच्चा दो, तन्दरूस्ती दो। जगत अम्बा के पास सब आशायें ले जाते हैं।
अभी तुम समझते हो हम पूज्य थे, अब पुजारी बने हैं फिर पूज्य बनते हैं। ज्ञान से रोशनी मिल गई है बच्चों को। तुम कितने निराले बन गये हो। ज्ञान अंजन सतगुरू दिया... तुम ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को जान गये हो। बुद्धि में आ गया है तो तुमको इस पढ़ाई का कितना कदर रहना चाहिए। वह पढ़ाई तुम जन्म-जन्मान्तर पढ़ते आये हो, मिलता क्या है? भूगरे (चने)। यह पढ़ाई एक जन्म पढ़ने से तुमको हीरे-जवाहरात मिलते हैं। अब पुरुषार्थ करना तो तुम बच्चों का काम है। नहीं पढ़ते हैं तो इसमें टीचर क्या करेंगे? कृपा की तो यहाँ बात ही नहीं। संगम पर देवताओं की सारी राजधानी स्थापन हो रही है। योगबल से तुम अपने विकर्मों का विनाश करते हो और ज्ञान बल अर्थात् नॉलेज से तुम कितना ऊंच बनते हो। ज्ञान सागर और ज्ञान नदियों द्वारा स्नान करने से सद्गति होती है। बच्चों को समझाने की युक्तियाँ मिलती रहती हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार जो कल्प पहले समझाया है वही समझाते रहते हैं। बच्चे भी नम्बरवार आते रहते हैं। ब्राह्मण कुल की वृद्धि होनी ही है। तुम बच्चों को महादानी बनना है। जो कोई आये उनको कुछ न कुछ समझाते रहो। शंखध्वनि करनी है। यहाँ जितनी तुम धारणा कर सकते हो उतनी घर में नहीं होती। शास्त्रों में भी मधुबन का गायन है वहाँ मुरली बजती है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) पढ़ाई का बहुत कदर रखना है। बाप से कृपा आदि नहीं मांगनी है। ज्ञान और योगबल जमा करना है।
2) रहमदिल बनना है। मुख से कभी कड़ुवे बोल नहीं बोलने हैं। सदा मीठा बोलना है। आप समान बनाने की सेवा जरूर करनी है।
वरदान:
सुख स्वरूप बन सबको सुख देने वाले मास्टर सुखदाता भव!
संगमयुगी ब्राह्मण अर्थात् दुख का नाम-निशान नहीं क्योंकि सुखदाता के बच्चे मास्टर सुखदाता हो। जो मास्टर सुखदाता, सुख स्वरूप हैं वह स्वयं दुख में कैसे आ सकते हैं। बुद्धि से दुखधाम का किनारा कर लिया। वे स्वयं तो सुख स्वरूप रहते ही हैं लेकिन औरों को भी सदा सुख देते हैं। जैसे बाप हर आत्मा को सदा सुख देते हैं ऐसे जो बाप का कार्य वो बच्चों का कार्य। कोई दुख दे रहा है तो भी आप दु:ख नहीं दे सकते, आपका स्लोगन है ''ना दु:ख दो, ना दु:ख लो।''
स्लोगन:
हर्षित और गम्भीर बनने के बैलेन्स को धारण कर एकरस स्थिति में स्थित रहो।
 

17/12/17MorningMurli

17/12/17 Madhuban Avyakt BapDada Om Shanti 11/04/83

"The qualifications of an easy effort-maker ."
BapDada is pleased to see His loving and co-operative children. On the basis of the two powers of love and the desire to meet, you become instruments to bring the incorporeal and subtle fathers into the corporeal form in the corporeal world, just like yourselves. You children tie the Father in the bond of love and devotion. The majority is now still of mothers. The image that depicts the divine activity of tying God in the bond of love is of mothers. To which tree did they tie him? You tied him to the unlimited kalpa tree with the strings of love and devotion in the previous cycle, and this is now being repeated. In response to the love of such children, BapDada takes the strings with which you have tied Him - the strings of love and devotion - and makes them into a seat of the heart-throne and returns it to you children as a swing. Those of you who are playing your part s in this kalpa tree continue to swing constantly in this swing. All of you have received the swing, have you not? You don’t leave your seat, do you? The strings of love and devotion are constantly strong, are they not? You don’t fluctuate, do you? The swing enables you to swing and to fly high too. However, if there is the slightest fluctuation, it also makes you fall from up high. BapDada has given all of you a swing. So, do you constantly swing in it? You mothers experience swinging and making others swing, do you not? BapDada is telling you about the things in which you are experienced. This is not anything new, is it? Are things you have experienced easy or difficult?

What gathering has gathered here today? Are all of you easy yogis, easy effort-makers and embodiments of easy attainment? Or, are you sometimes easy yogis and sometimes difficult yogis? To be an easy effort-maker means to be able to overcome any problem as high as the Himalayas that come, with the flying stage in just a second. To overcome means there must be something there that has to be overcome. Do you easily overcome everything and fly beyond them, or do you sometimes land on a mountain, sometimes in a river or sometimes in a jungle? What do you then say? Take me away from here! Or, save me! You are not those who do this, are you? You mothers don’t keep crying out the same thing again and again, do you? The sanskars of devotion have now ended, have they not? Have the cries of you Draupadis come to an end or do you still cry out? You have now become those with all rights. The time for calling out has come to an end. The confluence age is the time for attainment, not for calling out. To be an easy effort-maker means to overcome everything and to receive all attainments easily. Easy effort-makers would constantly experience attaining the reward now and in the future. Their reward will be clearly visible to them. Just as you are able to see something physical with your physical eyes, they will be able to see their reward through the intellect with the eye of experience, that is, with the divine third eye. Easy effort-makers will experience earning an income greater than multimillions at every step. In this way, you will constantly experience yourself to be a confluence-aged soul who is full of all treasures. You will never be empty of power, the treasure of any virtue, the treasure of any point of knowledge, happiness or intoxication. To become empty is the way to fall. A hole is made and you fall into that hole. When you sprain your ankle even a little, you become distressed. This is spraining the intellect: thoughts are twisted. Instead of being powerful and full of all treasures, you become weak and empty. So, that is a sprain of your thoughts. Why do you do this? You then say that the path was twisted. Is it not that you are crooked? Crooked paths have to be made straight, have they not? Why are you an incarnation of power? In order to straighten out that which is crooked. What contract did you make? The land under this hall has been levelled from being uneven and this is why you are able to sit in it comfortably. Ask the contractor of this hall did he ever think that he would ever be able to level out everything here that was uneven - or whether one’s ankle would be sprained? Did he level everything out or did he keep thinking about how everything was uneven? Sometimes, he had to break stone by dynamiting it and sometimes, he had to fill in a hole with stones. He had to make that effort. All of you have taken the contract to create heaven, have you not? You have taken the contract to make level what is uneven. Those who take on such contracts cannot say that the path is uneven. To fall suddenly is due to a lack of attention. Do you remember what was done in the sakar days when anyone fell down? That child’s toli would be stopped. Why? So that he or she would pay attention in the future. It is not a big thing to give toli. Toli is for you children anyway. However, that was also a form of love. To give toli is a sign of love and to stop giving that toli is also a sign of love. What do you think then? Would you say that you suddenly fell down or that the path was uneven? There still isn’t that much of a crowd now on this path of effort. The 900,000 subjects have not even been created yet. You are happy now with having just created 100,000. (In 1983 – 100,000 Brahmins, 2001 – 600,000 Brahmins, 2017 – nearly one million Brahmins). The path of effort is an unlimited path. So, do you understand who is called an easy effort-maker? One who doesn’t sprain his ankle, but becomes a guide for others and easily helps them to go across. An easy effort-maker doesn’t just have love but remains absorbed in love. Such souls, who are absorbed in love, easily remain distant from the vibrations and atmosphere everywhere, because to be absorbed in love means to be as powerful as the Father and to remain safe in every situation. Being equal is the biggest safe of all. It is a safe that is “Maya-proof.” So, do you understand what easy effort is? Easy effort means that there is no carelessness. Some move along considering carelessness to be easy effort. They are not constantly full of all treasures. The main characteristic of those who are careless effort-makers is that their conscience would continue to bite them internally while they would be singing externally. What would they be singing? They would continue to sing songs of their own praise. Easy effort-makers will constantly experience the company of the Father. Are you such easy effort-makers? An easy effort-maker can experience a constantly easy yogi life. So, what do you prefer? To be an easy effort-maker or a difficult one? You prefer easy effort, do you not? Since the Father is giving you something you like, why don’t you take it? “It happens even though I don’t want it to!” These are not the words of a master almighty authority. If you have a desire for one thing and yet your actions are something else, should you be called a Shiv Shakti?

To be a Shiv Shakti means to be one who has all rights, not someone who is dependent. So, those are not words of the Brahmin language. You understand your Brahmin language, do you not? A lot of time of the confluence age, that is, of the age of easy attainment, has passed by. Only a little more time now remains. In that too, you can make yourself an easy effort-maker by attaining blessings from the time and from the Father. The definition of a Brahmin is to be one who makes difficult things easy. This is the religion and action of Brahmins. To be Brahmins by birth and in action means to be easy yogis and easy effort-makers. So, what will you return from here as?

Madhuban is said to be the land of transformation. Burn the word “difficult” in this land of tapasya before you return and take back with you the blessing of easy effort. Take the vessel (power) of transformation, that is, the vessel of determination before you go and you will then be able to imbibe the blessings. Otherwise, some of you say that Baba gave you blessings, but that they were left behind in Abu. When you return home, you find that the blessing did not accompany you. Did you take the blessings from the Bestower of Blessings as one who is worthy of them? If you didn’t take them, where would they remain? They would remain with the One who gave them, would they not? Do not do this! You have become very clever. You do not understand your own faults. You say: I don’t know why Baba did this. You attribute all your weaknesses to the Father. Baba could do this if He wanted to, but He doesn’t do it! Is the Father the Bestower or does He take from you? The Bestower always gives, but those who are to take have to take! Or, should it be that the Father gives and He also takes? If the Father takes, how would you become full? Therefore, at least learn to take. Achcha. You have had a meeting now, have you not? Baba amused everyone, He entertained everyone and also saw everyone’s faces. At this time, all of your faces are very cheerful. All of you are swinging in the swings of happiness. So, is this not celebrating a meeting? To meet means to see each other’s face. You saw that, did you not? You have received the vessel (power) as well as the blessing. What else is there? You have already received toli from Didi and Dadi. Since the corporeal forms have been made instruments, why do you make the avyakt form corporeal? Didi and Dadi are also equal to the Father. Whenever you take toli from Didi or Dadi, what do you think when you take it? That BapDada is giving you toli. While taking toli, if you think that Didi or Dadi are giving it, that too is a mistake. Achcha, so you still have a desire for toli! You feel that if you receive toli, you will at least come in front of Baba. So, form a queue today and take your toli. Let your hearts continue to be filled. Let your hearts constantly continue to be filled, but not become full. It is good if a little part remains empty. It is only through that that you will remember Baba and continue to fill yourself. If you become full, you would say that you have become full. However, now, eat, drink and be merry! Achcha.

To all the constantly easy yogis, to the easy effort-makers, those who make the difficulties of others easy, to the master almighty authorities who are equal to the Father, to those who are constantly full of all treasures, to those who serve themselves as well as the world with all treasures, to such elevated souls, BapDada’s love, remembrance and namaste.

BapDada meeting different groups of mothers:

Do all of you constantly keep looking at your picture of the previous cycle? Which picture is it that shows your image with the Father and also depicts service? That of Goverdhan mountain being lifted. In this picture, the children are with the Father and both are doing service. To give your finger to lift the mountain is doing service, is it not? Your mind feels enthusiasm, because the memorial has been created of your co-operation, has it not? The finger is a sign of co-operation. All of you are co-operating with BapDada, are you not? Why have you taken birth? In order to co-operate. So, remain constantly aware that you have been co-operative souls from birth. Before, you didn’t know anything and you therefore used your body, mind and wealth for devotion. Whatever is now left, you use that for true service by co-operating with the Father. You have already wasted 99% and only one per cent now remains. If you don’t use that to co-operate with Baba, then where would you use it? Look at how you were kings of the golden age and how you are today! You don’t even have any strength in your body. The young ones of today are old. The youth of today are unable to do as much as the older ones can; they are youth just in name. You have even lost your wealth. From deities, you became businessmen merchants. You don’t even have peace of mind! You are constantly wandering around! So, you lost your peace of mind, your body, mind and wealth. So, what else is there? Nevertheless, be grateful that at least the one per cent of body, mind and wealth that still remains can be accumulated for 21 births, for 2500 years, by using it for God’s service. The Father constantly gives love and co-operation to such co-operative children. Even today, you can see the image of this co-operation. You are now doing it in practice and also seeing your image. Generally, no one sees his image after he has died. You are seeing your images of the previous cycle in the living form. Previously, you used to worship your own images. If you had known about that then, you wouldn’t just have sung praise of them but would become that. So, all of you are co-operating in this way, are you not? Constantly have the pure thought of co-operating in every task. Constantly co-operate in making all kinds of atmosphere powerful. Don’t allow there to be any upheaval in the atmosphere. Don’t be those who sometimes create upheaval instead of co-operating. Remain constantly co-operative, that is, remain constantly content. Belong to the one Father and none other and continue to move along and fly in this awareness. Whenever you have any thought, look up above and become carefree and continue to move along. To give your ideas and your signals is a different matter from being caught up in some upheaval. So, remain constantly stable and constant. Give your ideas and then become free from any thoughts. Constantly keep busy in self-progress and in the growth of service and have good wishes for everyone. Whatever good wishes are in your thoughts, they will be fulfilled. The way to fulfil your pure thoughts is to have a constant and stable stage. Have positive thoughts for yourself and for others. By doing this, you will become full in every aspect. The task of powerful, elevated souls is to make the atmosphere powerful everywhere. Achcha.
Blessing:
May you go fast with powerful avyakt sustenance and claim a right to a first number even though you have come last.
Souls who have come in the avyakt part have the easy fortune of going fast in their effort. This avyakt sustenance will easily make you powerful. Therefore, you can move forward as much as you want. This time has received the blessing of “Going fast though you have come last and coming first by going fast.” So, use this blessing, that is, use this blessing according to the time. Use whatever you have received and you will claim a right to claim a first number.
Slogan:
Remain set on your seat of self-respect and you will automatically receive respect from everyone.
 

17/12/17 प्रात:मुरली

17/12/17 मधुबन "अव्यक्त-बापदादा" ओम् शान्ति 11-04-83

“सहज पुरूषार्थी के लक्षण”
बापदादा अपने स्नेही, सहयोगी बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं। स्नेह और मिलन की भावना इन दो शक्तियों के आधार पर निराकार और आकार बाप को आप समान साकार रूप में साकारी सृष्टि में लाने के निमित्त बन जाते हो। बाप को भी बच्चे स्नेह और भावना के बन्धन में बांध लेते हैं। मैजारटी अभी भी माताओं की है। माताओं का ही चरित्र और चित्र दिखाया है - भगवान को भी बांधने का। किस वृक्ष से बांधा? इस बेहद के कल्प वृक्ष के अन्दर स्नेह और भावना की रस्सी से कल्प पहले भी बांधा था और अब भी रिपीट हो रहा है। बापदादा ऐसे बच्चों को स्नेह के रेसपान्ड में, जिस रस्सी से बाप को बांधते हो, इन स्नेह और भावना की दोनों रस्सियों को दिलतख्त का आसन दे झूला बनाए बच्चों को दे देते हैं। इस कल्प वृक्ष के अन्दर पार्ट बजाने वाले इसी झूले में सदा झूलते रहो। सभी को झूला मिला हुआ है ना! आसन से हिल तो नहीं जाते हो? स्नेह और भावना की रस्सियाँ सदा मज़बूत हैं ना! नीचे ऊपर तो नहीं होते! झूला झुलाता भी है, ऊंचा उड़ाता भी है और अगर जरा भी नीचे ऊपर हुए तो ऊपर से नीचे गिराता भी है। झूला तो बापदादा ने सभी को दिया है। तो सदा झूलते रहते हो! माताओं को झूलने और झुलाने का अनुभव होता है ना! जिस बात के अनुभवी हो, वह ही बातें बापदादा कहते हैं। कोई नई बात तो नहीं है ना! अनुभव की हुई बातें सहज होती हैं वा मुश्किल!
आज की यह कौन सी सभा है? सभी सहजयोगी, सहज पुरूषार्थी सहज प्राप्ति स्वरूप हो वा कभी सहज, कभी मुश्किल के योगी हो? सहज पुरूषार्थी अर्थात् आये हुए हिमालय पर्वत जितनी समस्या को भी उड़ती कला के आधार पर सेकण्ड में पार करने वाले। पार करने का अर्थ ही है कि कोई चीज़ होगी तब तो उसको पार करेंगे। ऐसे सहज पार करते, उड़ते जा रहे हो वा कभी पहाड़ पर उतर आते, कभी नदीं में उतर आते, कभी कोई जंगल में उतर आते। फिर क्या कहते? निकालो वा बचाओ। ऐसे करने वाले तो नहीं हो ना! मातायें अब भी बात-बात पर वही पुकार तो नहीं करती रहती! भक्ति के संस्कार तो समाप्त हो गये ना! द्रोपदी की पुकार पूरी हो गई या अभी भी चल रही है? अभी तो अधिकारी बन गये ना! पुकार का समय समाप्त हुआ। संगमयुग प्राप्ति का समय है न कि पुकार का समय है? सहज पुरूषार्थी अर्थात् सबको पार कर सर्व सहज प्राप्ति करने वाले। सहज पुरूषार्थी सदा वर्तमान और भविष्य प्रालब्ध पाने के अनुभवी होंगे। प्रालब्ध सदा ऐसे स्पष्ट दिखाई देगी जैसे स्थूल नेत्रों द्वारा स्थूल वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है। ऐसे बुद्धि के अनुभव के नेत्र द्वारा अर्थात् तीसरे दिव्य नेत्र द्वारा प्रालब्ध दिखाई देगी। सहज पुरूषार्थी हर कदम में पदमों से भी ज्यादा कमाई का अनुभव करेंगे। ऐसा स्वयं को सदा संगमयुगी सर्व खजानों से भरपूर आत्मा अनुभव करेंगे। किसी भी शक्ति से, किसी भी गुण के खजाने से, ज्ञान के किसी भी प्वाइंट के खज़ाने से, खुशी से, नशे से कभी खाली नहीं होंगे। खाली होना गिरने का साधन है। खड्डा बन जाता है ना। तो खड्डे में गिर जाते हैं। थोड़ी सी भी मोच आ जाती है तो परेशान हो जाते हैं ना! यह भी बुद्धि की मोच आ जाती है। संकल्प टेढ़ा हो जाता है। शक्तिशाली मालामाल के बदले कमजोर और खाली हो जाते हैं। तो संकल्प की मोच आ गई ना! ऐसे करते क्यों हो? फिर कहते हो रास्ता टेढ़ा है। आप टेढ़े नहीं हो? टेढ़े रास्ते को तो सीधा बनाया है ना! शक्ति अवतार किसलिए हो? टेढ़े को सीधा करने के लिए। कान्ट्रैक्ट क्या लिया है? जैसे इस हाल को टेढ़े बांके से सीधा किया तब तो आराम से बैठे हो। तो हाल के कान्ट्रैक्टर से पूछो उसने यह सोचा क्या कि टेढ़ा है, मोच आयेगी। सीधा किया वा टेढ़े को ही सोचता रहा। कहाँ पत्थर को उड़ाया, कहाँ पत्थर को डाला, मेहनत की ना। तो आप सबको स्वर्ग बनाने का कान्ट्रैक्ट है ना! टेढ़े को सीधा बनाने का कान्ट्रैक्ट है ना! ऐसे कान्ट्रैक्ट लेने वाले तो नहीं कह सकते कि रास्ता टेढ़ा है। अचानक गिरना, यह भी अटेन्शन की कमी है। साकार रूप में याद है ना, कोई गिरते थे तो क्या करते थे! उसकी टोली बन्द होती थी। क्यों? आगे के लिए सदा अटेन्शन रखने के लिए। टोली देना तो कोई बड़ी बात नहीं है। टोली तो होती ही बच्चों के लिए है। लेकिन यह भी स्नेह है। टोली देना भी स्नेह है, टोली बन्द करना भी स्नेह है। फिर क्या सोचा? अचानक गिर जाते हैं वा रास्ता टेढ़ा है, यह कहेंगे? अभी तो इस पुरूषार्थ के मार्ग में इतनी भीड़ कहाँ हुई है! अभी तो 9 लाख प्रजा भी नहीं बनी है। अभी तो एक लाख में ही खुश हो रहे हो। (83 में 1 लाख की संख्या थी) यह पुरूषार्थ का मार्ग बेहद का मार्ग है। तो समझा सहज पुरूषार्थी किसको कहा जाता है! जो मोच न खाये और ही औरों के लिए स्वयं गाइड, पण्डा बन सहज रास्ता पार करावे। सहज पुरूषार्थी सिर्फ लव में नहीं लेकिन लव में लीन रहता। ऐसी लवलीन आत्मा सहज ही चारों ओर के वायब्रेशन से वायुमण्डल से दूर रहती है क्योंकि लीन रहना अर्थात् बाप समान शक्तिशाली, सर्व बातों से सेफ रहना। तो समानता बड़े ते बड़ी सेफ है। है ही मायाप्रूफ सेफ। तो समझा सहज पुरूषार्थ क्या है! सहज पुरूषार्थ अर्थात् अलबेलापन नहीं। कई अलबेलेपन को भी सहज पुरूषार्थ मानकर चलते हैं। वो सदा मालामाल नहीं होगा। अलबेले पुरूषार्थी की सबसे बड़ी विशेषता अन्दर मन खाता रहेगा और बाहर से गाता रहेगा! क्या गाता रहेगा? अपनी महिमा के गीत गाता रहेगा। और सहज पुरूषार्थी सदा हर समय में बाप के साथ का अनुभव करेगा। ऐसे सहज पुरूषार्थी हो? सहज पुरूषार्थी सदा सहज योगी जीवन का अनुभव कर सकता है। तो क्या पसन्द है? सहज पुरूषार्थ या मुश्किल? पसन्द तो सहज पुरूषार्थ है ना! दिलपसन्द चीज जब बाप दे ही रहे हैं तो क्यों नहीं लेते। न चाहते भी हो जाता है, यह शब्द भी मास्टर सर्वशक्तिवान का बोल नहीं है। चाहना एक, कर्म दूसरा तो क्या उसको शिव-शक्ति कहेंगे!
शिव-शक्ति अर्थात् अधिकारी। अधीन नहीं। तो यह बोल भी ब्राह्मण भाषा के नहीं हुए ना! अपने ब्राह्मण भाषा को तो जानते हो ना! संगमयुग का अर्थात् सहज प्राप्ति का बहुत समय गया। अब बाकी थोड़ा सा समय रहा हुआ है। इसमें भी समय के वरदान, बाप के वरदान को प्राप्त कर स्वयं को सहज पुरूषार्थी बना सकते हो। ब्राह्मण की परिभाषा है ही मुश्किल को सहज बनाने वाला। ब्राह्मण का धर्म, कर्म सब यही है। तो जन्म के, कर्म के ब्राह्मण आत्मायें अर्थात् सहज योगी, सहज पुरूषार्थी। अब यहाँ से क्या बन करके जायेंगे?
मधुबन को परिवर्तन भूमि कहते हो ना! मुश्किल शब्द को तपोभूमि में भस्म करके जाना। और सहज पुरूषार्थ का वरदान ले जाना। परिवर्तन का पात्र अर्थात् दृढ़ संकल्प के पात्र को धारण करके जाना तब वरदान धारण कर सकेंगे। नहीं तो कई कहते हैं वरदान तो बाबा ने दिया लेकिन आबू में ही रह गया। वहाँ जाकर देखते हैं वरदान तो साथ आया ही नहीं। वरदाता का वरदान योग्य पात्र में लिया? अगर लिया ही नहीं तो रहेगा कहाँ? जिसने दिया उसके पास ही रहा ना! ऐसे नहीं करना। होशियार बहुत हो गये हैं। अपना कसूर नहीं समझेंगे। कहेंगे पता नहीं बाबा ने क्यों ऐसे किया! अपनी कमजोरियाँ सब बाप के ऊपर रखते हैं। बाबा चाहे तो कर सकता है लेकिन करना नहीं है। बाप दाता है या लेता है? दाता तो देता है लेकिन लेने वाले लेवें भी ना! या देवे भी बाप और लेवे भी बाप। बाप लेंगे तो आप कैसे भरपूर होंगे! इसलिए लेना तो सीखो ना! अच्छा - मिलन तो हो गया ना। सबसे हंसे, बहले, सबके चेहरे देखे। इस समय तो बहुत अच्छे चियरफुल चेहरे हैं। सभी खुशी के झूले में झूल रहे हैं। तो यह मिलना नहीं हुआ! मिलना अर्थात् मुखड़ा देखना और दिखलाना। देखा ना! पात्र भी मिला, वरदान भी मिला। बाकी क्या रह गया? टोली तो दीदी दादी से खा ली है। जब व्यक्त रूप में निमित्त बना दिया है तो अव्यक्त को क्यों व्यक्त बनाते हो! दीदी दादी भी बाप समान हैं ना! जब भी दीदी दादी से टोली लेते हो तो क्या समझकर लेते हो? बापदादा टोली दे रहे हैं। अगर दीदी दादी समझ लेते तो यह भी भूल हो जायेगी। अच्छा तो बाकी टोली की इच्छा अभी है। समझते हैं टोली खायेंगे तो आगे तो आयेंगे ना। तो आज ही सबकी क्यू लगाओ और टोली खाओ। दिल तो कब भरने वाली है नहीं। दिल भरती रहनी चाहिए। भर नहीं जानी चाहिए। कुछ न कुछ रहना ठीक है। तब तो याद करते रहेंगे और भरते रहेंगे। भर गई तो फिर कहेंगे भर गया अब खाओ पीयो मौज करो। अच्छा।
सब सदा के सहज योगी, सहज पुरूषार्थी, सदा सर्व की मुश्किलातों को सहज करने वाले, ऐसे बाप समान मास्टर सर्वशक्तिवान, सदा मालामाल, सर्व खजानों से स्व सहित विश्व की सेवा करने वाले, ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
पार्टियों के साथ (माताओं से)
1- सभी अपना कल्प पहले वाला चित्र देखते रहते हो? ऐसा कौन सा चित्र है जिस चित्र में बाप का साथ भी है और सेवा भी दिखाई है? गोवर्धन पर्वत उठाने का। इस चित्र में बाप के साथ बच्चे भी हैं और दोनों ही सेवा कर रहे हैं। पर्वत को अंगुली देना सेवा हुई ना! मन में उमंग आता है ना कि सहयोगी बनने का भी यादगार बन गया है। अंगुली सहयोग की निशानी है। सभी बाप दादा के सहयोगी हो ना! जन्म ही किसलिए लिया है? सहयोगी बनने के लिए। तो सदा स्मृति में रखो कि हम जन्म से सहयोगी आत्मा हैं। तन-मन-धन जैसे पहले मालूम नहीं था तो भक्ति में लगाया और अभी जो बचा हुआ है वह सच्ची सेवा से, बाप के सहयोगी बन लगा रहे हो! 99प्रतिशत तो गंवा दिया बाकी 1प्रतिशत बचा है। अगर वह भी सहयोग में नहीं लगायेंगे तो कहाँ लगायेंगे! देखो कहाँ सतयुगी राजा और आज क्या हो? तन में भी शक्ति कहाँ हैं! आज के जवान बूढ़े हैं। जितना बूढ़े काम कर सकते, उतना आज के जवान नहीं कर सकते। नाम की जवानी है। और धन भी गँवा दिया, देवता से बिजनेस वाले वैश्य बन गये। और मन की शान्ति भी कहाँ रही, भटक रहे हो। तो मन की शान्ति, तन, धन सब गँवा दिया, बाकी क्या रहा! फिर भी चक्र करो 1 परसेन्ट भी बचा हुआ तन-मन-धन ईश्वरीय कार्य में लगाने से 21 जन्म 2500 वर्ष के लिए जमा हो जाता है। ऐसे सहयोगी बच्चों को बाप भी सदा स्नेह देते हैं, सहयोग देते हैं। और इसी सहयोग का चित्र अभी भी देख रहे हो। अभी प्रैक्टिकल कर भी रहे हो और चित्र भी देख रहे हो। वैसे कोई मरने के बाद अपना चित्र नहीं देखता। आप चैतन्य में कल्प पहले वाला चित्र देख रहे हो। पहले अपने ही चित्र की पूजा करते थे। अगर पता होता तो गायन नहीं करते, बन जाते। तो ऐसे सभी सहयोगी हो ना! सदा हर कार्य में सहयोग देने का शुभ संकल्प, कभी भी किसी भी प्रकार के वातावरण को शक्तिशाली बनाने में सदा सहयोगी। वातावरण को भी नीचे ऊपर नहीं होने देना। सहयोगी बनने के बदले कभी हलचल करने वाले नहीं बन जाना। सदा सहयोगी अर्थात् सदा सन्तुष्ट। एक बाप दूसरा न कोई, चलते चलो, उड़ते चलो। कोई भी संकल्प आये तो ऊपर देकर स्वयं नि:संकल्प होकर चलते जाओ। विचार देना, इशारा देना यह दूसरी बात है, हलचल में आना यह दूसरी बात है। तो सदा एकरस। संकल्प दिया और निरसंकल्प बने। सदा स्व उन्नति और सेवा की उन्नति में बिजी रहो और सर्व के प्रति शुभ भावना रखो। जिस शुभ भावना से जो संकल्प रखते वह सब पूरा हो जाता है। शुभ संकल्प पूरे होने का साधन है एकरस अवस्था। शुभ चिन्तन, शुभचिंतक - इसी से सब बातें सम्पन्न हो जायेगी। चारों ओर के वातावरण को शक्तिशाली बनाना यही है शक्तिशाली श्रेष्ठ आत्माओं का कर्तव्य। अच्छा।
वरदान:
अव्यक्त पालना द्वारा शक्तिशाली बन लास्ट सो फास्ट जाने वाले फर्स्ट नम्बर के अधिकारी भव!
अव्यक्त पार्ट में आने वाली आत्माओं को पुरूषार्थ में तीव्रगति का भाग्य सहज मिला हुआ है। यह अव्यक्त पालना सहज ही शक्तिशाली बनाने वाली है इसलिए जो जितना आगे बढ़ना चाहे बढ़ सकते हैं। इस समय लास्ट सो फास्ट और फास्ट सो फर्स्ट का वरदान प्राप्त है। तो इस वरदान को कार्य में लगाओ अर्थात् समय प्रमाण वरदान को स्वरूप में लाओ। जो मिला है उसे यूज़ करो तो फर्स्ट नम्बर में आने का अधिकार प्राप्त हो जायेगा।
स्लोगन:
स्वमान की सीट पर सेट रहो तो सर्व का मान स्वत: प्राप्त होगा।
 

Friday, December 15, 2017

16/12/17MorningMurli

16/12/17 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban

"Sweet children, you have now each received the third eye of knowledge. You know that you hear this knowledge from the Innocent Lord every 5000 years and change from human beings into deities."
Question:
What is the main reason why you are not able to imbibe knowledge?
Answer:
Your intellect wanders, there isn't full yoga with the One and you haven't become soul conscious. That is why you become unable to imbibe knowledge. Baba says: Children, don't come into familiarity. Don't remember the name and form of one another. Make firm the lesson from ‘Belonging to the one Father and none other’. Don't chase after others. Continue to take advice from the Father because, by doing so, you will be liberated from sorrow and you will be able to imbibe well.
Song:
No one is unique like the Innocent Lord.  
Om Shanti
The Innocent Lord is the One who gives. Shiv Baba is called the Innocent Lord. The Innocent Lord existed in the past and He definitely put right that which had gone wrong. He went away having told you the beginning, the middle and the end. That is why devotees sing His praise. You children know that the Innocent Lord, who is remembered as the One who puts right that which has gone wrong, is personally sitting in front of you. Devotees remember God and sing His praise and the Father is playing His part. The Father has come and given His own introduction to you children. It is in the intellects of you children that whatever Baba explains to you now, He explains that to you every cycle. Every cycle He comes and makes the impure world pure. He is doing that now. Many people now know this, but there are also many more who don't know this. Those who are to claim their inheritance will come and claim their inheritance as they did in the previous cycle. Previously, you too didn't know that Baba would come and give you your inheritance. You now know this. He is truly the Protector of the devotees. He tells you the knowledge of the beginning, the middle and the end. He is called the Ocean of Knowledge. It touches your hearts that He is the same One who comes and takes birth in Bharat. His alokik birth is remembered. He comes and purifies the people of Bharat. Impure human beings who call out definitely have to understand that they were pure, that they became impure and that they now have to become pure once again. Now, by receiving your third eye from the Father, you have understood all of these things. The churning of the ocean of knowledge of you children continues throughout the day. Who was pure in the golden age? It was truly the deities who were that. At that time there were no other religions. There are images of the deities too, but they would not be called that. You wouldn't refer to their images as Shri Lakshmi devi or Shri Narayan devta. They are not here now. When they existed, there were no other religions. It is in the intellects of you children that Baba is telling you a true story, but people say that they haven't heard this knowledge before. That is because they don’t know the secrets of the drama. You say that you have been listening to this every cycle. Was it not spoken to you 5000 years ago? Then, why do you say that you have never heard it before? The one who related it to you in the previous cycle, you are now listening to that One once again. You should explain this well. You also heard this knowledge 5000 years ago. It has been 5000 years since the deities existed. Who made them into deities from human beings? Even now, the same Father will make them that. The Father has to come again after 5000 years to purify those who have been made impure by Ravan. History and geography must repeat. You also understand that history repeats. After the golden age, there is the silver age, then the copper age… You go around the cycle. It is now the end of the iron age. On one side there are the flames of destruction, and on the other side, Baba has come here to establish the new world. This is that same Mahabharat War. People believe that destruction of the human world will take place through this. Everyone understands this. You can see the destruction of the old world. This Great Mahabharat War also took place 5000 years ago; it is not a question of hundreds of thousands of years. This Bharat was heaven and it was the kingdom of those deities. They were the masters of the golden age. You have to explain very well using the pictures too. This is why the pictures of Lakshmi and Narayan have been created. There are in fact so many pictures of Lakshmi and Narayan in Bharat. So, why do we make more? We make meaningful pictures. These pictures have the full knowledge in them. Human beings are confused. This is why it is explained that it was their kingdom in the golden age. There were very few human beings at that time, and those who did exist took rebirth and became impure from pure. This world is tamopradhan and it has to become pure once again. The explanation is very easy. The Father says: I am telling you a story of 5000 years ago: Long, long ago , there used to be the kingdom of Lakshmi and Narayan here, that is, 3000 years before Christ, it was the golden age. Heavenly God, the Father, established heaven. Bharat is said to be an ancient land where gods and goddesses used to rule. It is said: Goddess Radhe and God Krishna. Radhe and Krishna, or Lakshmi and Narayan, existed in the golden age. Rama and Sita existed in the silver age. The account of 5000 years is clear. When it was their kingdom, all other souls were in the land of liberation. Souls are imperishable. Souls are never destroyed. The drama too is imperishable. You souls have received your imperishable part s of 84 births. The whole part s are recorded in such tiny souls. These are such wonderful matters! This is called nature. It is such a tiny point and it has a whole part of 84 births, of 5000 years, recorded within it. It is imperishable and it also definitely has to repeat. This is the biggest wonder of all. God is a point and souls too are points. However, God is the Supreme. Souls are not all the same; they are numberwise. First is Supreme Shiv Baba and then you would say Lakshmi and Narayan. Brahma and Saraswati cannot be called s upreme. It is Lakshmi and Narayan who are perfect and then all the rest are numberwise, one after another. The main ones praised are the deities. The Supreme Soul of all is Shiv Baba. Then there are Brahma, Vishnu and Shankar in the subtle region. Then there are Lakshmi and Narayan, Rama and Sita etc. All are numberwise. Actors in a play are also numberwise; not all are the same. It would be said that this one's soul is a supreme actor, whereas that one is an actor worth a few pennies. Who is the first-class Creator and Director? Only the one Supreme Father, the Supreme Soul, is Karankaravanhar. You now know about the whole drama. This is an unlimited drama. It is explained to you in a nutshell. The deity religion is the foundation of the tree. Then the branches of Islam, Buddhism and Christianity emerge from that. This would seem like a flower vase. The tree seems right. However, if you were to sit and count each leaf, there would be so many! The cults and sects of Islam, Buddhism etc. are all counted. Shiva, the Innocent Lord, is giving you this knowledge. There is no question of beating drums etc. They have written in the scriptures whatever entered their minds. In fact, they were the drums of knowledge. It is also called blowing the conch shell. A conch shell is blown with your mouth. This is the flute of knowledge. He sits here and tells you the beginning, the middle and the end of the drama. A soul is like a point and has a whole part recorded within him. He is the Creator. He also acts. He takes the best part. It is numberwise. That One is the one Father, the Creator, whereas all the rest are those who enter rebirth. That One never takes rebirth. His birth is unique; you know how He comes and enters this one. Other souls also enter other human beings. For instance, when the soul of someone's wife comes, she would be able to say that she is happy, but he wouldn't be able to embrace her, because the body is of a different person. There is the faith that that is the soul of his wife that has been called. They call many souls in this way. Now, everyone has become tamoguni and so they do not tell anything accurately about what a soul is or how it comes and goes. All of this is fixed in the drama in advance. It isn't that that soul leaves the other body and comes here and the body dies there; no. The Father says: I grant them a vision in order to fulfil their desires. Whatever is fixed in the drama happens. Every second that passes is fixed in the drama. This is an unlimited play. The Father is a point. The point is called the Innocent Lord. It is such a wonder ! The Father also says: I, a point, have such a big part recorded in Me. None of these things can sit in the intellects of new people. So many of the old ones are also unable to understand these things. So they become nervous when explaining to others, just as some people are nervous when speaking on the radio. Here, you have to conduct the murli very enthusiastically. Those people read and relate everything. Here, everything is done orally. Baba also tells you everything orally. Your intellects are imbibing everything. In the previous cycle too, you imbibed this and related it to many. This knowledge then disappeared. It now has to repeat. This knowledge is not in the intellects of sages or holy men. They don't know God. They say that the soul will merge into the Supreme Soul. How could it merge into Him? You souls now know that your Father has come and is giving us knowledge. We will then return home with Baba. You children have this spiritual intoxication. This is your family path. Many people tell you that you are kumars and kumaris and so you don't have any experience of vice. They say: We are those who indulge in vice while living at home with our family. How can you give us this knowledge? We are married couples and so how can bachelors explain this to us? Married couples who are experienced should explain to us. Only those who have indulged in vice themselves can explain to us how they conquered vice. Baba receives many such letters. This is right. Therefore, you should get such experienced people who are married but who remain pure to write letters. Some even had children but have now become pure. They say: Such people should explain to us. The knowledge is very good but, if we don’t have a clever person to explain to us, we become confused. Many things come in front of them, so the one who explains to them should be experienced. You can’t explain as much to anyone through letters. If they were to come personally and meet Baba, Baba too would explain to them. There are many such couples who can share their experiences of how they live in a household and follow shrimat completely. They even take full precautions over their food and drink. If the person explaining to them is not good, they become confused. Your intellects should work for service. You also have to become soul conscious. You mustn't come into familiarity. This takes effort. Maya traps you again and again. You cannot reach your karmateet stage now. Many become trapped in the name and form of one another. Then, they don’t even write to Baba telling Baba of the storms they faced; they don't tell the truth. If they were to write to Baba, Baba would show them a method. Some do write the truth. Shiv Baba knows everything. He explains: If you have such activity, there will be a lot of punishment by Dharamraj. Throughout the day you continue to have such thoughts. Many go to a centre and say: So-and-so explains very well. However, inside, there are devilish thoughts. Here, you need to have yoga with the One. Let there only be the one Father and none other. Why should you chase after others? If you are unable to imbibe knowledge, your intellect must definitely be wandering somewhere and then, because you are afraid, you don't even ask for advice. The Father says: Constantly remember Me alone. It is only by having this remembrance that your sins will be absolved. You will also be liberated from sorrow. Everyone asks for liberation. You become liberated from sorrow and then go into happiness. Liberation-in-life is for everyone. However, you first have to go into liberation and then into liberation-in-life. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.
Essence for Dharna:
1) Blow the conch shell of knowledge, like the Father. Don’t relate knowledge simply by reading it. Imbibe it first and then explain it.
2) Take great care over your food and drink. Follow shrimat and share your experience with others about how you remain pure while living in your household.
Blessing:
May you be completely knowledgeable and yogi and merge yourself in the experience of love by knowing the importance of the confluence age.
The confluence age is the age of God’s love. Know the importance of this age and merge yourself in the experience of love. The Ocean of Love is giving you platefuls of diamonds and pearls, and so constantly keep yourself full. Do not become happy with just a little experience; become full. The diamonds and pearls of God’s love are invaluable. Constantly remain decorated with these because love is yoga and to merge yourself in love is complete knowledge. Those who constantly experience spiritual love are completely knowledgeable and yogi.
Slogan:
Those who remain beyond any wasteful feeling can become conquerors of Maya.
 

16/12/17 प्रात:मुरली

16/12/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम्हें अभी ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, तुम जानते हो हर 5 हजार वर्ष बाद भोलानाथ बाप द्वारा हम यह ज्ञान सुनकर मनुष्य से देवता बनते हैं”
प्रश्न:
ज्ञान की धारणा न होने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
बुद्धि भटकती है, एक के साथ पूरा योग नहीं है। देही-अभिमानी नहीं बने हैं इसलिए धारणा नहीं होती है। बाबा कहते बच्चे, फैमिलियरटी में नहीं आओ। एक दो के नाम-रूप को मत याद करो। एक बाप दूसरा न कोई - यह पाठ पक्का कर लो, दूसरों के पिछाड़ी न पड़ो। बाप से राय लेते रहो, इससे तुम दु:ख से लिबरेट हो जायेंगे। धारणा भी अच्छी होगी।
गीत:-
भोलेनाथ से निराला....  
ओम् शान्ति।
भोलानाथ है देने वाला। भोलानाथ शिवबाबा को तो कहते ही हैं। भोलानाथ होकर गया है और बरोबर बिगड़ी बनाकर गया है। आदि-मध्य-अन्त का राज़ बताकर गया है, इसलिए भगत गाते हैं। तुम बच्चे जानते हो जिस भोलानाथ का गायन है, जो बिगड़ी को बनाने वाला है, वह हमारे सम्मुख बैठा है। भगत भगवान को याद करते हैं, उनकी महिमा गाते हैं और बाप अपना पार्ट बजा रहे हैं। बाप ने ही आकर अपना परिचय दिया है, बच्चों को। बच्चों की बुद्धि में बैठा है कि बाबा जो समझाते हैं वह बरोबर कल्प-कल्प समझाते हैं। कल्प-कल्प आकर पतित दुनिया को पावन दुनिया बनाते हैं। अभी बना रहे हैं। बहुतों को अभी पता पड़ा है। अभी बहुत हैं जिन्हों को पता नहीं है - वर्सा लेने वाले होंगे तो कल्प पहले मुआफिक आकर वर्सा लेंगे। तुमको पहले थोड़ेही यह मालूम था कि बाबा आकर वर्सा देंगे। अभी मालूम पड़ा है। बरोबर भक्तों का रक्षक है। आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान सुनाते हैं। उनको ज्ञान का सागर कहा जाता है। दिल से लगता है बरोबर यह वही हैं जो भारत में आकर जन्म लेते हैं। इनका अलौकिक जन्म गाया हुआ है। भारतवासियों को आकर पतित से पावन बनाते हैं। पतित मनुष्य जो बुलाते हैं वह जरूर समझते होंगे हम पावन थे, अब पतित बने हैं, फिर पावन बनना है।
अभी बाप द्वारा तीसरा नेत्र मिलने से तुमने यह सब कुछ समझा है। तुम बच्चों का सारा दिन विचार सागर मंथन चलता रहेगा। सतयुग में पावन कौन थे? बरोबर देवी-देवता ही थे। उस समय और कोई धर्म नहीं था। देवताओं के चित्र भी हैं और कोई नाम नहीं लेंगे। ऐसे नहीं कहेंगे चित्र हैं। श्री लक्ष्मी देवी, श्री नारायण देवता। अभी वह नहीं हैं। जब वह थे तो और कोई धर्म नहीं था। तुम बच्चों की बुद्धि में है कि बाबा हमको सत्य कथा सुनाते हैं। तो लोग कहते हैं यह ज्ञान तो हमने सुना नहीं है क्योंकि उनको ड्रामा के राज़ का तो पता नहीं हैं। तुम कहेंगे यह तो कल्प-कल्प तुम सुनते आये हो। क्या 5 हजार वर्ष पहले नहीं सुनाया था? फिर यह क्यों कहते हो आगे कभी नहीं सुना है। कल्प पहले जिसने सुनाया था उस द्वारा तुम अभी भी सुन रहे हो। अच्छी रीति समझाना चाहिए। तुमने तो 5 हजार वर्ष पहले भी यह ज्ञान सुना था। देवताओं को 5 हजार वर्ष हुए हैं। उन्हों को मनुष्य से देवता किसने बनाया? अभी भी वही बाप फिर से बनायेगा। 5 हजार वर्ष बाद फिर से बाप को आना पड़ता है। रावण द्वारा पतित बने हुए को पावन बनाने। हिस्ट्री-जॉग्राफी मस्ट रिपीट। यह भी समझ में आता है हिस्ट्री रिपीट होती है। सतयुग के बाद त्रेता... चक्र लगाते हैं। अभी कलियुग का अन्त है। एक तरफ विनाश ज्वाला खड़ी है - दूसरी तरफ बाबा यहाँ आये हैं, नई दुनिया स्थापन करने अर्थ। यह वही महाभारत लड़ाई है। समझते हैं इससे विनाश हो जायेगा - मनुष्यों की दुनिया का। यह सबको समझ में आता है। पुरानी दुनिया का विनाश देखने में आता है। यह महाभारी महाभारत लड़ाई 5 हज़ार वर्ष पहले भी लगी थी। कोई लाखों वर्ष की बात नहीं है। यह भारत ही स्वर्ग था। इन देवताओं का राज्य था। यह सतयुग के मालिक थे। चित्रों पर भी अच्छी रीति समझाना पड़ता है इसलिए ही यह लक्ष्मी-नारायण आदि के चित्र बनाये हैं। यूँ लक्ष्मी-नारायण के चित्र तो भारत में ढेर हैं, फिर हम बनाते हैं, क्यों? हम अर्थ सहित बनाते हैं। इनमें पूरा ज्ञान है। मनुष्य तो मूँझे हुए हैं इसलिए समझाया जाता है - सतयुग में इन्हों का राज्य था। बहुत थोड़े मनुष्य थे जो होकर गये हैं वही फिर पुनर्जन्म ले पावन से पतित बनेंगे। यह दुनिया ही तमोप्रधान है फिर पावन बनना है। समझानी तो बहुत सहज है। बाप कहते हैं मैं तुमको 5 हजार वर्ष पहले की कहानी सुनाता हूँ। लाँग-लाँग एगो... यहाँ इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था अथवा क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले सतयुग था। हेविनली गॉड फादर ने हेविन स्थापन किया था। भारत को कहते भी हैं प्राचीन देश है, इसमें गॉड गॉडेज राज्य करते थे। गॉड कृष्ण, गॉडेज राधे कहते हैं। राधे-कृष्ण लक्ष्मी नारायण सतयुग में थे, फिर राम-सीता त्रेता में 5 हजार वर्ष का हिसाब-किताब क्लीयर है। जब उन्हों का राज्य था तो बाकी सब आत्मायें मुक्तिधाम में थी। आत्मा तो अविनाशी है। आत्मा का कभी विनाश नहीं होता। ड्रामा भी अविनाशी है। आत्मा को 84 जन्मों का अविनाशी पार्ट मिला हुआ है। इतनी छोटी सी आत्मा में सारा पार्ट भरा हुआ है। यह कितनी वन्डरफुल बात है, इसको ही कुदरत कहा जाता है। इतनी छोटी बिन्दी कितना 84 जन्मों का पार्ट, 5 हजार वर्ष का पार्ट उसमें भरा हुआ है। वह भी अविनाशी, जो रिपीट जरूर करना है। यह बड़े ते बड़ी कुदरत है। परमात्मा भी बिन्दी, आत्मा भी बिन्दी। परन्तु परमात्मा सुप्रीम है। आत्मायें तो सब एक जैसी नहीं हैं, नम्बरवार हैं। पहले सुप्रीम शिवबाबा फिर कहेंगे लक्ष्मी-नारायण। ब्रह्मा-सरस्वती को सुप्रीम नहीं कहेंगे। सम्पूर्ण तो लक्ष्मी-नारायण है फिर नम्बरवार एक दो के पिछाड़ी आते हैं। मुख्य गायन है देवताओं का। सबसे सुप्रीम आत्मा शिवबाबा की है फिर सूक्ष्मवतन में ब्रह्मा-विष्णु-शंकर फिर लक्ष्मी-नारायण, राम-सीता सब नम्बरवार हैं। नाटक में भी एक्टर नम्बरवार होते हैं। सब एक जैसे नहीं होते हैं। कहेंगे इनकी आत्मा सुप्रीम एक्टर है, यह पाई पैसे का एक्टर है। सबसे फर्स्टक्लास क्रियेटर, डायरेक्टर कौन है? करनकरावनहार एक ही परमपिता परमात्मा है। अब तुमको सारे ड्रामा का पता पड़ा है। यह है बेहद का ड्रामा, नटशेल में तुमको बताया जाता है। झाड़ का यह देवी-देवता धर्म है फ़ाउन्डेशन। फिर उनसे टालियाँ इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन निकले हैं। यह फ्लावरवाज़ होगा। झाड़ शोभता है ना। बाकी एक-एक धर्म के पत्ते बैठ गिनती करो तो कितने होंगे। इस्लामी, बौद्धी सबके मठ पंथ गिने जाते हैं। शिव भोलानाथ यह ज्ञान सुनाते हैं। बाकी कोई डमरू आदि बजाने की बात नहीं है। शास्त्रों में जो आया सो लिख दिया है। वास्तव में है ज्ञान की डमरू, इनको शंखध्वनि भी कहा जाता है। शंखध्वनि मुख से की जाती है। यह है ज्ञान की मुरली। ड्रामा के आदि-मध्य अन्त का राज़ बैठ सुनाते हैं। आत्मा बिन्दी मिसल है, जिसमें सारा पार्ट नूँधा हुआ है। वह क्रियेटर है। वो एक्ट भी करते हैं। अच्छा पार्ट वह लेते हैं। नम्बरवार तो होते हैं ना। यह है ही एक बाप क्रियेटर और सब पुनर्जन्म में आने वाले हैं। यह कभी पुनर्जन्म नहीं लेते हैं, इनका अलौकिक जन्म है। तुम जानते हो कैसे आकर प्रवेश किया है। दूसरी आत्मायें भी प्रवेश करती हैं ना। समझो किसके स्त्री की आत्मा आती है। बोल सकेगी कि मैं सुखी हूँ। बाकी उनके शरीर को भाकी नहीं पहन सकेंगे क्योंकि शरीर तो दूसरा है ना। भावना है कि यह हमारे स्त्री की आत्मा है, इनको बुलाया गया है। ऐसे बहुतों को बुलाते हैं। अभी तमोगुणी हो गये हैं इसलिए एक्यूरेट बताते नहीं हैं। आत्मा क्या चीज़ है, कैसे आती-जाती है। यह ड्रामा में पहले से ही नूँध है। ऐसे नहीं आत्मा निकलकर यहाँ आती है। वह मर जाती है, नहीं। बाप कहते हैं यह मनोकामना पूर्ण करने के लिए साक्षात्कार कराता हूँ, जो ड्रामा में नूँध है। सो होता है। सेकण्ड पास हुआ, ड्रामा में नूँध है। यह बेहद का नाटक है। बाप बिन्दी है। बिन्दी को भोलानाथ कहते हैं। कितना वन्डर है। बाप भी कहते हैं मुझ बिन्दी में कितना पार्ट है। यह बातें नये कोई की बुद्धि में बैठ न सकें। पुरानों से भी कितनों की समझ में नहीं आता है। तो किसको समझाने में मूँझते हैं, जैसे रेडियों में कोई बात करने में मूँझते हैं। इसमें मुरली बड़ी फुर्ती से चलानी है। वह पढ़कर सुनाते हैं। यह है ओरली। बाबा भी सब कुछ ओरली सुनाते हैं। तुम्हारी बुद्धि में धारणा हो रही है। कल्प पहले भी तुमने धारणा कर बहुतों को सुनाया है। फिर वह ज्ञान खत्म हो गया। अब फिर रिपीट होना है। यह ज्ञान कोई साधू-सन्त की बुद्धि में नहीं है। वह परमात्मा को नहीं जानते। वह कह देते हैं - आत्मा परमात्मा में मिल जायेगी। मिलेगी फिर कैसे? अभी तुम्हारी आत्मा जानती है कि हमारा बाप आया है। हमको नॉलेज दे रहा है। फिर हम बाबा के साथ घर जायेंगे। यह तुम बच्चों को रूहानी नशा है। यह है तुम्हारा प्रवृत्ति मार्ग। बहुत तुमको कहते हैं कि तुम तो कुमार अथवा कुमारी हो। तुमको विकारों का अनुभव ही नहीं। हम तो विकारी गृहस्थ में रहने वाले हैं। तुम हमको यह ज्ञान कैसे दे सकते हो? हम हैं युगल, हमको बैचलर कैसे समझा सकेगा? हमको तो युगल समझाये, जो अनुभवी हो? विकार में गया हुआ हो, वही हमको समझा सकते हैं कि हमने ऐसे जीत पाई। ऐसे-ऐसे बाबा के पास पत्र आते हैं। बात तो ठीक है अब ऐसे अनुभवी से पत्र लिखाना चाहिए, जिसने भल शादी की हो परन्तु पवित्र हो। कोई को बाल-बच्चे थे, फिर पवित्र बने हैं। ऐसे-ऐसे हमको समझायें। ज्ञान तो बहुत अच्छा है। परन्तु कोई तीखा समझाने वाला नहीं है तो मैं मूँझ जाता हूँ। बहुत बातें सामने आती हैं। तो अनुभवी समझाने वाला हो। अब पत्रों द्वारा तो किसको इतना समझा नहीं सकते। सम्मुख आकर मिलें तो बाबा भी समझाये। ऐसे-ऐसे बहुत युगल हैं जो अपना अनुभव सुना सकते हैं कि हम ऐसे प्रवृत्ति में रह श्रीमत का पूरा-पूरा पालन कर रहे हैं। खान-पान की भी पूरी परहेज रखते हैं। कोई समझाने वाला ठीक नहीं है तो मूँझ पड़ते हैं। सर्विस के लिए बुद्धि चलनी चाहिए। देही-अभिमानी भी बनना है। कोई भी फैमिलियरटी में नहीं आना चाहिए। मेहनत लगती है। माया घड़ी-घड़ी फँसा लेती है। कर्मातीत अवस्था अभी हो नहीं सकती। बहुत एक दो के नाम-रूप में फँस पड़ते हैं। फिर बाबा को लिखते भी नहीं कि बाबा यह-यह तूफान आते हैं। सच नहीं बताते हैं। बाबा को लिखें तो बाबा युक्ति भी बतायें। कोई-कोई सच लिखते हैं। शिवबाबा तो सब कुछ जानते हैं। समझाते हैं अगर ऐसी कोई चलन चली तो धर्मराज द्वारा बहुत दण्ड भोगना पड़ेगा। सारा दिन ख्यालात चलते रहते हैं। सेन्टर पर आते हैं। कहते हैं फलानी बहुत अच्छा समझाती है। परन्तु अन्दर शैतानी भरी पड़ी होगी। यहाँ तो एक के साथ योग चाहिए। बाप के सिवाए दूसरा न कोई। क्यों दूसरे के पीछे पड़े। धारणा नहीं होती है तो जरूर कहाँ बुद्धि भटकती है फिर राय भी नहीं पूछते हैं। डरते हैं। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। इस याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। दु:ख से तुम लिबरेट हो जायेंगे। मुक्ति तो सब माँगते हैं। मुक्त होते हैं दु:ख से फिर सुख में आयेंगे। जीवनमुक्ति सबके लिए है। परन्तु पहले मुक्ति में जाकर फिर जीवनमुक्ति में आना है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बाप समान ज्ञान की शंख ध्वनि करनी है। सिर्फ पढ़ करके नहीं सुनाना है। धारणा करके फिर समझाना है।
2) खान-पान की बहुत परहेज रखनी है। श्रीमत का पालन कर प्रवृत्ति में रहते हुए कैसे पवित्र रहते हैं, यह अनुभव दूसरों को सुनाना है।
वरदान:
संगमयुग के महत्व को जान स्नेह की अनुभूतियों में समाने वाले सम्पूर्ण ज्ञानी योगी भव!
संगमयुग परमात्म स्नेह का युग है। इस युग के महत्व को जानकर स्नेह की अनुभूतियों में समा जाओ। स्नेह का सागर स्नेह के हीरे मोतियों की थालियां भरकर दे रहे हैं, तो अपने को सदा भरपूर करो। थोड़े से अनुभव में खुश नहीं हो जाओ, सम्पन्न बनो। ये परमात्म प्यार के हीरे-मोती अनमोल हैं, इससे सदा सजे सजाये रहो क्योंकि यह स्नेह ही योग है और स्नेह में समाना ही सम्पूर्ण ज्ञान है। ऐसे रूहानी स्नेह का सदा अनुभव करने वाले ही सम्पूर्ण ज्ञानी-योगी हैं।
स्लोगन:
जो व्यर्थ की फीलिंग से परे रहता है वही मायाजीत बनता है।